शैलेंद्र तिवारी 

उत्तरप्रदेश में सियासी पारा गरम है। चुनाव से ठीक पहले तक भाजपा को अ​जेय योद्धा के तौर पर देखा जा रहा था। माना जा रहा था कि चुनाव केवल औपचारिकता भर हैं और योगी आदित्यनाथ को एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालनी है। लेकिन यही लोकतंत्र है और यही इसकी खूबसूरती… कब सियासत एक नया रूप लेकर बैठ जाए कोई नहीं जानता। उत्तर प्रदेश में भी कुछ यही हो रहा है, कल तक जो भाजपा की जीत के दावे कर रहे थे, वही अब कह रहे हैं कि मुकाबला कड़ा है और चुनाव फंस गया है। तो सवाल यही है कि आखिर मुकाबला कड़ा क्यों हो गया और आखिर में आकर क्यों फंस गया। अभी तो उत्तर प्रदेश में केवल दो ही चरणों का मतदान हुआ है।

दरअसल, सियासत में चुनाव से पहले और बाद के आकलन हमेशा अलग ही साबित हुए हैं। 2017 में भाजपा की जीत की उम्मीद थी, लेकिन जीत इतनी बड़ी होगी शायद ही किसी ने अंदाजा लगाया होगा। यही सियासत है और यही इसका तरीका। अभी भी परिणाम किस करवट बैठेंगे, कोई नहीं कह सकता है। हां, इतना स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि जो आकलन आज किया जा रहा है, वह 10 मार्च को गलत ही साबित होगा। उसकी वजह है, मतदाता मौन है और वह स्पष्ट नहीं कर रहा है कि आखिर उसका रुख किस ओर है।

अभी तक दो चरणों का मतदान पूरा हो चुका है। माना जा रहा है कि भाजपा का प्रदर्शन वैसा नहीं रहा है, जैसा कि 2017 में उसने इन चरणों में किया था। वैसे चुनाव पूर्व भी यही आकलन था कि भाजपा यहां पर कुछ ज्यादा बेहतर की उम्मीद नहीं कर रही है। हालांकि ब्रज, बुंदेलखंड और मध्य उत्तर प्रदेश यानि अवध में भाजपा की उम्मीदें शीर्ष पर हैं। 2017 में भी भाजपा ने इन इलाकों में तूफानी प्रदर्शन किया था। लेकिन यहां पर भी भाजपा धीरे-धीरे मुकाबले में फंसती हुई नजर आ रही है। जो सीटें एक महीने पहले तक स्पष्ट तौर पर भाजपा के खाते में थीं, उन्हीं पर वह बुरी तरह से फंसी हुई हैं। तभी तो गृहमंत्री अमित शाह का खीजते हुए वीडियो सामने आता है, स्मृति ईरानी को भी रोड शो में मजा नहीं आ रहा है।

वैसे मुकाबले में मौजूद समाजवादी पार्टी के अभियान भी शहरों में यूं ही निपटे जा रहे हैं। उसके उम्मीदवार भी कुछ ज्यादा बेहतर विकल्प के तौर पर उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि समाजवादी पार्टी को ग्रामीण इलाकों में जमकर भीड़ मिल रही है। वैसे भी ग्रामीण मतदाता शहर के लोगों की तुलना में ज्यादा मुखर होता है।

बुंदेलखंड हमेशा से भाजपा और बसपा के मुकाबले का मैदान रहा है। यहां पर सपा हमेशा से तीसरे नंबर की पार्टी रही है, लेकिन ऐसा पहली बार है कि मुकाबले में भाजपा और सपा है। यह यूं ही नहीं है, इसके पीछे भी कई वजहें हैं। वजह है, भाजपा नेताओं का घमंड, उनकी सत्ता के उपभोग की बुरी आदत। आम आदमी को दोयम दर्जे का मानने की सियासत। दूसरे शब्दों में कहें तो इन पांच सालों में भाजपा को वो सभी रोग लगे हैं, जो सियासत में उसे कल्याण सिंह सरकार के दौरान लगे थे। कांग्रेस तो उत्तर प्रदेश की सियासत के नेपथ्य में हैं। सो, उसे कोई उम्मीद नहीं है। उसे उम्मीद गोवा, पंजाब और उत्तराखंड में है सो उसकी लड़ाई जारी है।

सपा के लिए यह मुकाबला करो और मरो वाला है। अखिलेश यादव को मालूम है कि अगर इस बार चूक गए तो फिर दोबारा मौका नहीं मिलेगा। न पार्टी के भीतर और न ही पार्टी के बाहर। उन्हें दोनों ही मुकाबलों में अपने को साबित करना है। यही वजह है कि परिवार के लोगों को मैदान में उतारने के बजाय उन्हें मैदान संभालने की जिम्मेदारी दी गई है। चाचा को मुलायम के पीछे खड़ा करके परिवार के साथ होने का भरोसा मतदाताओं को दिया है, वो भी अपने घर से।

वोट किसको मिलेगा, कौन जीतेगा…यह कहा नहीं जा सकता है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि भाजपा ने अपना बेहतर चुनाव कहीं न कहीं खो दिया है। यह ठीक उस तरह से है कि क्रिकेट के मैच में जीता हुआ मैच कुछ बेवकूफियों के कारण फंसा लिया जाए और आखिरी तक सस्पेंस बना रहे कि विजेता कौन होगा। जब भी चुनाव खामोश होते हैं तो स्पष्ट मानकर चलिएगा उसके पीछे आदमी के बड़े मुद्दे होते हैं। वहां हिंदू-मुसलमान नहीं होता है…वहां पर जातियां नहीं होती हैं। वहां पर आदमी की दो वक्त की रोटी की चिंता होती है। वहां जीवन को जीने का तनाव होता है। वहां आने वाले कल की चिंता होती है। चुनावी जुमले हर कोई देगा, लेकिन सवाल यही है कि सियासत के इस दौर में उत्तरप्रदेश में क्या आने वाले बेहतर भविष्य की बात होगी। क्या राजनीतिक दल मुफ्तखोरी से बाहर निकलकर उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की कोशिश करेंगे।

कल फिर वोट डाले जाएंगे, पता नहीं कल कौन से साब सुबह भाषणनुमा इंटरव्यू लेकर अवतरित हो जाएं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश को अपना भविष्य खुद सोचना होगा। क्योंकि यह वही प्रदेश है, जिसके लगभग हर दूसरे घर से एक लड़का दूसरे राज्य में नौकरी कर रहा है। क्योंकि हमारे पास आबादी तो है लेकिन नौकरी नहीं है। नेतागिरी तो है लेकिन काम-धंधा नहीं है। ​और इस सियासत में भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा सभी एक जैसे हैं, बस चेहरे अलग हैं…इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। इस बर्बाद गुलिस्तां में कम बर्बाद कौन है, यही चुनने का चुनाव है बस…।
(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।)
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