“रोशनी सिरहाने पर धरकर सोने वालों का अँधेरे को चीरने की संघर्ष कथा से भला क्या लेना-देना?  कैसी विडंबना है अट्टालिकाएं बनाने वाले मजदूर फुटपाथ पर सोते हैं। घर की सडांध साफ करने वालों का सडांध ही घर होता है, सड़क बनाने वाले जिंदगी भर गलियों में जीते हैं। जमीन से खोद कर हीरा निकालने वालों को चौमासे घास की रोटी खानी पड़ती है.. विषमता की ऐसी विडंबनाएं अनादि हैं! सो इसीलिए हम कहते हैं- कभी नहीं इस जीवनक्रम में गति का अर्थ प्रगति होता है.. लेकिन यहां हम एक दूसरी कहानी कहने जा रहे हैं जिस पर शायद ही किसी की नजर जाती हो”

जयराम शुक्ल

यह कहानी है… सतना की एक जाँबाज लड़की मांडवी गुप्ता की जो शहर में घर घर अखबार बाँटती है/थी, यानी कि हॉकर। हमने ‘स्टार समाचार’ के वर्ष 2013 के 26 मार्च के अंक में उसकी संघर्ष कथा प्रकाशित की थी। तब माँडवी 15 वर्ष की थी अब 23 वर्ष की होगी, अभी भी हॉकरी के मोर्चे पर डटी है या नहीं, मुझे पता नहीं। संभव है शादी ब्याह भी हो चुका हो। अखबार बाँटना मांडवी का यह पैत्रिक व्यवसाय था। पिता के लाचार, असमर्थ होने पर अपने छोटे भाइयों को पढ़ाने, पालने, पोसने का भार उसने खुद उठाया था।

चाहे मूसलाधार बारिश हो या कड़कड़ाती ठंड अन्य हॉकरों की तरह सुबह साढ़े चार बजे मांडवी भी साइकिल पर डिस्ट्रीब्यूशन सेंटर पहुँच जाती थी। उसे इस काम को लेकर कोई मलाल नहीं था सिवाय इसके कि यदि वह बीमार पड़ी तो उसके छोटे-छोटे मासूम भाइयों का क्या होगा?

इस स्टोरी की याद आज इसलिए आई कि करोना महामारी के प्राणलेवा संक्रमण के दौर में हमारे हॉकर बंधुओं की जिंदगी भी दाँव पर है। वे आज भी बिना नागा सुबह-सुबह अखबार पहुँचा रहे हैं। सभी बड़े अखबार दावे के साथ यह तो कह रहे हैं कि अखबार वायरस नहीं फैलाते लेकिन वे हॉकरों की जिंदगी की चिंता को लेकर चुप हैं।

राजधानी भोपाल समेत प्रदेश के अन्य शहरों में कुछ एजेंटों/हॉकरों ने जब हम सब की तरह करोना से खुद की सुरक्षा के बारे में सोचा कि कहीं हम भी संक्रमित होकर मौत के मुँह में न चले जाएं.. इसलिए लॉकडाउन तक अखबार बाँटना स्थगित कर दें, तो बड़े अखबार समूहों के सेल्स/सर्कुलेशन मैनेजर तमतमा गए। धमकी दी कि जो इन दिनों अखबार नहीं बाँटेगा वह भविष्य में कभी भी नहीं बाँट पाएगा। एजेंसियों के टर्मिनेशन की धमकी दी गई।

बेबस हॉकरों ने आँधी-तूफान-बारिश-कड़कड़ाती ठंड, दंगा,कर्फ्यू की तरह ही करोना महामारी को अपनी नियति समझकर अखबार बाँटना जारी रखा। वैसे भी कोई इनके घर तक राशन पहुँचाने वाला नहीं था और न ही इनकी कुशलक्षेम पूछने वाला। अखबार बाँटने का धंधा यानी कि हॉकरी का काम कच्चा व्यवसाय है। कोई बीमार पड़ता है तो कुछ दिन उसकी ‘लाइन’ उसके दोस्त सँभालते हैं और अंततः मांडवी जैसी बेटियों को इस चुनौती के सामने कमर कसना पड़ती है।

हॉकरों की जिंदगी सारी उमर साइकिल के चक्कों सी घूमती रहती है, उसके असली हमदर्द अखबारों के सेठ नहीं, पैडल और हैंडल होते हैं। हम जैसे नामधारी संपादक/पत्रकार सरकार से हर तरह की सुविधा हासिल करने में लगे रहते हैं, सरकारी घर, बंगला, पुरस्कार, सत्कार विभाग की गाड़ी, फोकट का होटल, बुढापे के लिए सम्मान निधि। यह सब सामर्थ्य के हिसाब से मिल भी जाता है। पर इन हॉकरों का क्या, न स्वास्थ्य बीमा, न जोखिम बीमा। सम्मान निधि, पीएफ, ईपीएफ की बात ही कौन करे।

दुर्भाग्य देखिए कि ऐसे संकट में मीडिया समूह, उनके अच्छे खासे पैकेज वाले सीईओ/संपादक, स्वयंसेवी संगठन, सरकार इनके बारे में क्या कुछ कर रहे/करने की सोच रहे, अभी तक कहीं से इसकी खबर नहीं मिली है। इस संकट के समय रोज सुबह घर-घर तक ताजा खबर पहुँचाने वालों की खबर लेने वाला कोई दाता-धर्मी नहीं।

हम मध्यप्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री और उनके जनसंपर्क विभाग से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि आपकी खबरों के मोर्चे पर जो ये हॉकर भाई किसी अनथक योद्धा की भाँति डटे हैं उनकी भी सुधि लें। इन्हें बीमा कवरेज में लाएं, इनके राशनपानी की चिंता करें और लॉकडाउन पीरियड में जो जीवन निर्वहन भत्ता अन्य लोगों श्रमिकों/बेसहारों को दे रहे हैं वह इन्हें भी दें।

अखबार के ग्राहकों से भी अपील है कि अलसुबह उठकर इन्हें करोना योद्धाओं की भाँति सलाम ठोंके न ठोंके इनका कुशलक्षेम जरूर पूछें।