नायरा परवीन
तपती दोपहर में जब आप और हम अपने घरों के बंद कमरों में एयर कंडीशनर की ठंडी हवा का आनंद ले रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त हमारे स्मार्टफोन की एक छोटी सी 'क्लिक' सड़क पर किसी अजनबी नौजवान की जिंदगी में तूफान ला देती है। ऐप पर स्क्रीन चमकती है-"10 मिनट में डिलीवरी न हुई, तो पैसे कटेंगे।" पिछले मोड़ पर लगा ट्रैफिक जाम उस लड़के के माथे पर पसीने की बूंदें बनकर उभर आता है। वह लाल बत्ती पार करता है, गलत दिशा में गाड़ी दौड़ाता है और अपनी जान हथेली पर रखकर हमारे दरवाजे पर गर्म खाना या ठंडा जूस पहुंचा देता है। हम उसे मुस्कुराकर एक 'थैंक यू' कहते हैं, दरवाजा बंद करते हैं और फाइव-स्टार रेटिंग दे देते हैं। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि इस चमक-दमक वाली 'गिग इकॉनमी' के पीछे असली कीमत कौन चुका रहा है?
आज देश में लगभग सवा करोड़ लोग इसी तरह की अस्थाई और फ्रीलांस नौकरियों से जुड़े हैं जिन्हें हम डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर या घरेलू ब्यूटीशियन के रूप में रोज देखते हैं। अनुमान है कि अगले कुछ सालों में यह संख्या दोगुनी हो जाएगी। वजह साफ है; स्मार्टफोन का आना, सस्ता इंटरनेट और हम शहरी उपभोक्ताओं की हर चीज तुरंत पाने की आदत। युवाओं को भी लगता है कि यहाँ कोई बॉस नहीं है, जब चाहो काम करो और मर्जी हो तो छुट्टी मनाओ। लेकिन यह 'आजादी' सिर्फ एक छलावा है। हकीकत यह है कि यहाँ बॉस कोई इंसान नहीं, बल्कि एक मशीनी 'एल्गोरिदम' यानी कंप्यूटर का कोड है। यह कोड किसी का सगा नहीं होता। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहर का तापमान 45 डिग्री है, मूसलाधार बारिश हो रही है या सड़क पर जानलेवा ट्रैफिक है। अगर आप तय समय से चूके, तो यह सॉफ्टवेयर आपकी कमाई काट लेगा, आपकी रेटिंग गिरा देगा और एक झटके में आपको काम से ब्लॉक कर देगा।
दुख की बात यह है कि दिन-रात सड़कों पर दौड़ने वाले इन कामगारों में से लगभग 40 प्रतिशत की मासिक आय 15 हजार रुपये से भी कम है। इस छोटी सी रकम में से उन्हें अपनी गाड़ी का पेट्रोल, मेंटेनेंस और बीमा भी खुद देखना पड़ता है। इससे भी ज्यादा संवेदनशील स्थिति उन महिलाओं की है जो हमारे घरों में आकर ब्यूटी या क्लीनिंग सर्विसेज देती हैं। तकनीकी भाषा में इन्हें 'स्वतंत्र ठेकेदार' कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब यह है कि ये किसी कंपनी की पक्की कर्मचारी नहीं हैं। इस एक तकनीकी पेंच के कारण वे कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न रोधी कानून के सुरक्षा कवच से बाहर हो जाती हैं। यदि किसी ग्राहक के घर उनके साथ कोई बदतमीजी हो, तो कंपनियां यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि वे तो सिर्फ एक जरिया (एग्रीगेटर) थीं, मालिक नहीं।
दुनिया भर में अब इस अदृश्य शोषण के खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं। ब्रिटेन की अदालतों ने साफ कहा है कि इन वर्कर्स को महज कॉन्ट्रैक्टर नहीं, बल्कि कर्मचारी माना जाए और उन्हें न्यूनतम वेतन व छुट्टियां दी जाएं। भारत में भी सरकार ने सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत कंपनियों से उनके टर्नओवर का कुछ हिस्सा इन वर्कर्स के फंड में जमा करने की बात कही है। राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों ने तो बाकायदा इसके लिए कानून बनाने की पहल की है। लेकिन असली चुनौती इन कानूनों को इस अमानवीय सॉफ्टवेयर की कैद से बाहर निकालने की है।
समाधान यह नहीं है कि हम इस व्यवस्था को बंद कर दें, क्योंकि यह लाखों युवाओं के पेट पालने का जरिया है। रास्ता यह है कि हम इस तकनीक को थोड़ा सा 'मानवीय' बनाएं। कंपनियों के एल्गोरिदम में पारदर्शिता हो, वर्कर्स को अपनी बात रखने का मौका मिले और सबसे बढ़कर, हमारी '10 मिनट की हड़बड़ी' किसी की जान की कीमत पर न हो। तकनीक का काम इंसानी जिंदगी को आसान बनाना है, उसे बंधुआ बनाना नहीं। जब तक हम जीडीपी और मुनाफे के आंकड़ों से ऊपर उठकर इन वर्कर्स के चेहरों पर छिपी बेबसी को नहीं समझेंगे, तब तक सड़क पर दौड़ती यह रफ्तार हमारे आधुनिक होने के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती रहेगी।