आकाश शुक्ला

कोरोना के संकट काल में क्या पूरी क्षमता से स्कूल खोलना एक दुस्साहसी कदम होगा? यह प्रश्न हर बच्चे के माता-पिता से पूछने पर उनका जवाब शायद हां ही आयेगा। क्योंकि देश में कोरोना के मरीज निरंतर बढ़ रहे हैं और वर्तमान में 4280422 से ऊपर व्‍यक्ति कोरोना पीड़ित हो चुके हैं। 72775 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। हर दिन मरीजों और मृतकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

कोरोना संक्रामक है और माता-पिता परिवार के लालन पालन और रोजगार के लिए अपनी जान की रिस्क तो ले सकते हैं परंतु बच्चों के जीवन पर इस बीमारी का संकट आ जाए यह कोई नहीं चाहेगा। स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या इतनी अधिक है कि पूरी क्षमता से स्कूल खुलने पर बच्चों को संक्रमण से बचाना मुश्किल ही होगा और उनके एकत्रित होने से फैला संक्रमण उनके परिवार एवं घर के बुजुर्गों में भी फैलेगा। बच्चों की प्रवृत्ति वैसे भी एक दूसरे से मिलने जुलने की रहती है एवं उनसे हमेशा मास्क लगाने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है।

इसलिए कोरोना के साथ साथ चलने वाली वैकल्पिक शिक्षा व्यवस्था पर विचार जरूरी है। कोरोना काल में वैकल्पिक तौर पर ऑनलाइन शिक्षा जरूरी है, लेकिन भौतिक रूप से क्लास रूम में दी जाने वाली शिक्षा का महत्व और उपयोग अधिक है। कोरोना वायरस का सबसे अधिक दुष्प्रभाव शिक्षा व्यवस्था और अध्यापन कार्य पर पड़ा है। स्कूल से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा लगभग ठप हो गई है। हालांकि कुछ स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालयों ने जूम, गूगल क्लासरूम, माइक्रोसॉफ्ट टीम, स्काइप जैसे प्लेटफॉर्मों के साथ-साथ यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि के माध्यम से ऑनलाइन शिक्षण का विकल्प अपनाया है, जो इस संकट-काल में एक रास्ता है।

परंतु इस वैकल्पिक रास्ते को स्कूलों में दी जा रही भौतिक उपस्थिति के साथ क्लासरूम शिक्षा का स्थाई विकल्प नहीं माना जा सकता। ऑनलाइन शिक्षा के किसी भी माध्यम में छात्र छात्राओं का पूरा ध्यान पढ़ाई में उस अनुपात में नहीं लग पाता जितना क्लासरूम शिक्षा में लगता है। क्लासरूम शिक्षा छात्र को शिक्षा के प्रति नियमित, गंभीर, उत्तरदायित्व पूर्ण बनाती है। कोरोनाकाल का कोई अंत वर्तमान में समझ में नहीं आता और स्कूल पूरी क्षमता के साथ शुरू होने पर इसका दुष्प्रभाव पड़ने की संभावना अधिक है। इस कारण हम बच्चों के स्वास्थ्य का खतरा मोल लेकर स्कूलों को पूरी क्षमता के साथ शुरू नहीं कर सकते हैं।

इसलिए बीच का रास्ता निकलते हुए वैकल्पिक ऑनलाइन शिक्षा और कम संख्या में छात्रों की उपस्थिति के साथ शैक्षणिक संस्थाओं को प्रारंभ किया जाना चाहिए। जिन स्कूलों में पर्याप्त डिस्टेंस के साथ छात्र छात्राओं को बैठाने की व्यवस्था हो वहां छात्र छात्राओं को समूहों में बांटकर अलग-अलग दिन अलग-अलग समूह को स्कूल बुलाकर अध्यापन कार्य प्रारंभ किया जा सकता है। जिस दिन छात्र-छात्राएं स्कूल ना आएं उस दिन उन्हें ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से पढ़ाया जाना चाहिए। ऑनलाइन शिक्षा के दौरान बच्चों को होम असाइनमेंट दिया जाना चाहिए जिनकी चेकिंग स्कूलों में समय-समय पर हो।

ऑनलाइन शिक्षा का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव यह पड़ा है कि जिन छोटे-छोटे बच्चों को हम मोबाइल और इंटरनेट से दूर रखना चाहते थे उनको ऑनलाइन शिक्षा की मजबूरी के चलते मोबाइल और कंप्यूटर के सामने हमने खुद बैठने के आदेश दिए, इसका दुष्परिणाम यह आया कि बच्चे मोबाइल और इंटरनेट के एडिक्ट हो गए हैं, इससे बच्चों की आंखो, हड्डियों, गर्दन और रीढ़ की हड्डी संबंधी और अन्य शारीरिक समस्याएं होने का खतरा बढ़ गया है। भविष्य में मोबाइल और इंटरनेट के एडिक्शन के दुष्प्रभाव का इलाज करना भी महत्वपूर्ण समस्या हो जाएगा। इसलिए हम बच्चों को पूर्णत: ऑनलाइन शिक्षा पर निर्भर भी नहीं कर सकते हैं। ऑनलाइन और क्लासरूम शिक्षा के बीच की कोई व्यवस्था हमें कोरोना काल के दौरान लागू करने पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।

इस वर्ष को जीरो शैक्षणिक सत्र मानते हुए, कुछ पाठ्यक्रम इस साल पढ़ाकर, शेष पाठ्यक्रम आगे एक दो कक्षाओं में अलग-अलग बांटकर और उन्‍हें आगे पढ़ा कर भी इस शैक्षणिक सत्र को पूर्ण किया जा सकता है। पूर्ण रूप से ऑनलाइन एजुकेशन लागू करने का एक दुष्परिणाम यह भी है कि हमारे देश के अधिकांश ग्रामीण अंचल से आने वाले गरीब छात्र-छात्राओं के पास ऑनलाइन पढ़ाई करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं, कहीं-कहीं तो मोबाइल तक नहीं है। कहीं मोबाइल है तो डाटा के रिचार्ज के लिए राशि की कमी है, कहीं घर में एक मोबाइल है और पढ़ने वाले चार है।

बिना संसाधन के ऐसी स्थिति में ऑनलाइन शिक्षा सभी को देना संभव नहीं है। ऐसे छात्र छात्राओं को नियमित अंतराल पर छोटे-छोटे समूहों में क्लासरूम शिक्षा देकर शिक्षा से जोड़ा जा सकता है। वर्तमान में स्कूल खोलने की व्यवस्था संसाधनों से संपन्न वर्ग और संसाधनों की कमी से जूझ रहे वर्ग दोनों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर और समाहित करके की जाना चाहिए। नहीं तो कोरोना काल में बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में जो खाई है वह और बढ़ेगी।

बच्चों को स्कूल बुलाते समय कोरोना से बचने के समस्त उपाय करना अनिवार्य बनाते हुए उन का कड़ाई से पालन करना होगा। बच्चों में संक्रमण तो नहीं है इसकी प्रारंभिक जांच की व्यवस्था, पर्याप्त मात्रा में सैनिटाइजर की उपलब्धता, क्लास रूम का नियमित सैनिटाइजेशन और पर्याप्त शारीरिक दूरी बनाए रखने की व्यवस्था, बच्चों के पास मास्क की उपलब्धता जैसी कोरोना से बचाव की व्यवस्थाएं करने के बाद ही सीमित संख्या में स्कूलों का संचालन करने की अनुमति देना चाहिए।

कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बावजूद जिस लापरवाही पूर्ण तरीके से बाकी सारी सुविधाएं खोली गईं, उसके कारण कोराना के मरीजों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। ऐसी लापरवाही हम बच्चों के साथ नहीं कर सकते, क्योंकि पूरी क्षमता के साथ स्कूल खोल कर बच्चों को कोरोना से बचाव के लिए आत्मनिर्भर बनने के लिए छोड़ देंगे तो इसके दुष्परिणाम परिवार, देश और संपूर्ण समाज पर पड़ेंगे।