मप्र उपचुनाव: सरकार की सुरखी, भज गोविन्दम की मजबूरी

सुरखी उपचुनाव 

डॉ. अजय खेमरिया

सुरखी विधानसभा में मौजूदा खाद्य मंत्री गोविंदसिंह राजपूत के लिए उपचुनाव में फिर से जीतकर आना बड़ी  सियासी चुनौती है। राजपूत के लिए नया दल, नए लोग तो चुनौती हैं ही, लेकिन उनके सामने एक बड़ा काम अपनी कोर टीम को संतुष्ट करना है, जो 15 महीने के मंत्री कार्यकाल में उनसे बुरी तरह खफा हो चुकी है। मंत्री के रूप में भले उनके पास विकास कार्यों की लंबी फेहरिस्त हो लेकिन उनकी कार्यपद्धति में जो केन्द्रीयकरण का भाव रहा है उसने उन स्थाई समर्थकों को नाराजगी से भर दिया है जो वर्षों से गोविन्द सिंह के राजतिलक का इंतजार कर रहे थे।

सुरखी का राजनीतिक इतिहास

सागर जिले की यह सीट बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण रही है। बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह यहां से दो बार जीते हैं। एक जमाने में कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार विट्ठल भाई पटेल भी 1980 से 90 तक यहां से एमएलए रह चुके हैं। पिछले दस चुनाव पर नजर डालें तो कांग्रेस यहां 5 बार और बीजेपी, जनता दल भी 5 बार जीत दर्ज कर चुके हैं। 2018 में गोविन्द सिंह यहां से जीते थे।

जातीय गणित

सुरखी विधानसभा में यादव, लोधी, पटेल, दांगी अहिरवार, ब्राह्मण, वैश्य, कुशवाहा, ठाकुर, मुस्लिम, बघेल बिरादरियों के मतदाता प्रमुख हैं। यादव जाति से लक्ष्मीनारायण यादव, दांगी से भूपेंद्र सिंह, पटेल समाज से विट्ठल भाई यहां से जीत चुके हैं।

2018 में क्यों जीते थे राजपूत

2013 में राजपूत 141 वोट के मामूली अंतर से पारुल साहू से हार गए थे। इस दौरान वे लगातार सक्रिय रहे और 2018 में सांसद लक्ष्मीनारायण यादव के बेटे सुधीर यादव को उन्होंने बड़े मार्जिन से हराया। बीजेपी ने अपनी सिटिंग एमएलए पारुल साहू का टिकट काटकर, सांसद के बेटे सुधीर यादव को टिकट दी, लेकिन वे 20 हजार से ज्यादा वोट से हार गए। किसान कर्जमाफी, सवर्ण आंदोलन औऱ पारुल की नाराजगी के साथ पटेल, लोधी, बघेल वोटरों के परम्परागत बैंक में सेंध लगने से बीजेपी को यहां भारी नुकसान हुआ। इसके अलावा पार्टी समय रहते यहां पारुल के टिकट पर निर्णय भी नहीं कर पाई।

बीजेपी में असंतोष का अलार्म

गोविन्द राजपूत यहां बीजेपी के मैदानी कार्यकर्ताओं से संवाद की कोशिशें कर रहे हैं। पूर्व सांसद लक्ष्मी नारायण यादव के घर जाकर वह दो बार चाय पी चुके हैं। कभी जिस पारुल साहू को उन्होंने दारू वाली (शराब कारोबार के चलते) कहकर बवंडर खड़ा कर दिया था, अब उन्हें अपनी छोटी बहन बताकर साधने की कोशिशें कर रहे हैं। 2008 में बीजेपी से प्रत्याशी रहे राजेन्द्र सिंह मोकलपुर से भी भाईचारा बढ़ाने में राजपूत कोई कसर नहीं छोडना चाहते।

इसके बाबजूद इन नेताओं की नाराजगी अभी दूर नहीं हुई है। पारुल और सुधीर यादव बीजेपी मुख्यालय में दो दिन पूर्व बुलाई गई बैठक में भी शामिल नहीं हुए है। राजपूत को 1998 में शिकस्त दे चुके खुरई विधायक भूपेंद्र सिंह भी कैसे उपचुनाव में समन्वय बनाएंगे यह भी बड़ा सवाल है। नेता विपक्ष गोपाल भार्गव के दावे को दरकिनार कर सागर से राजपूत को मंत्री बनाया गया है। यह संतुलन आगे क्या गुल खिलाएगा?

बीजेपी की मजबूती जमीन पर?

सुरखी  में गोविन्द सिंह की खुद की जमीन भी है, क्योंकि वे हारने के बावजूद यहां सक्रिय रहते हैं, उनके भाई हीरा सिंह कांग्रेस के अभी तक जिलाध्यक्ष थे और पूरा परिवार क्षेत्र में निरन्तर सक्रिय बना रहता है। इसके अलावा बीजेपी के पास यहां जीत की इबारत लिखने के लिए सशक्त जातीय नेता भी हैं। भूपेंद्र सिंह दांगी समाज से आते हैं, जो खुद यहां से दो बार जीते हैं। ब्राह्मणों के लिये पूर्वमंत्री और 6 बार से विधायक गोपाल भार्गव, सागर विधायक शैलेन्द्र जैन, अहिरवार समाज के दिग्गज विधायक प्रदीप लारिया, धरमु राय, लोधी समाज के लिए उमा भारती प्रहलाद पटेल व पूर्व सांसद लक्ष्मीनारायण यादव,जैसे नेता हैं।

खास बात यह है कि ये सभी सागर जिले के ही हैं। अगर बीजेपी संगठन प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर इस सीट पर लड़ता है तो सुरखी में उसकी जीत में कोई संशय नहीं है। लेकिन बुनियादी सवाल इन दिग्गजों के साथ जुड़ी उनकी चिंताओं का है क्योंकि इनमें से कोई मंत्री नहीं है, और राजपूत बिना जीते कैबिनट मिनिस्टर हैं। सागर में भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव, शैलेन्द्र जैन, प्रदीप लारिया वरिष्ठता के अनुसार मंत्री पद के स्वाभविक दावेदार है।

अजय सिंह को उतार सकती है कांग्रेस

गोविंद राजपूत सिंधिया के सबसे निकटतम लोगों में एक हैं, उनका परिवार 30 साल से सिंधिया से जुड़ा है। 1996 में विकास कांग्रेस बनाये जाने पर भी राजपूत परिवार माधवराव सिंधिया के साथ था। उसके बाद गोविन्द को युवा कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया गया। दिग्विजय सिंह से राजपूत की पटरी कभी नहीं बैठी। कहते हैं 1998 में जब वे मामूली वोटों से हारे थे, तब दिग्गीराजा ने ही कलेक्टर को रिकाउंटिंग से रोक दिया था।

अब कांग्रेस यहां से अजय सिंह को उतारने पर विचार कर रही है ताकि राजपूत, दलित और पटेल के साथ मुस्लिम समीकरण को साधा जाए। इसके अलावा जीवन पटेल, पूर्व विधायक अरुणोदय चौबे का नाम भी दावेदारों में शामिल है। चर्चा पारुल साहू और कभी राजपूत के चलते ही कांग्रेस छोड़ बीजेपी में गए राजेन्द्र मोकलपुर की भी कांग्रेस से लड़ने की चल रही है।

रोचक लड़ाई

सुरखी में बहुत रोचक स्थिति है। जिले में बीजेपी के पास 8 में से 5 सीटें हैं। सभी मंत्री पद के प्रबलतम दावेदार हैं लेकिन इस जिले से जो फिलहाल बीजेपी सरकार में मंत्री हैं वह जीवन भर कांग्रेसी रहे हैं और अभी तो विधायक भी नहीं, फिर भी दो पूर्व काबीना मंत्री समेत बीजेपी के सभी दिग्गजों को सुरखी में पसीना बहाना होगा। क्योंकि सरकार की सुरखी तभी कायम रहेगी, जब गोविन्द सिंह की सीट सुरक्षित रहेगी।

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टीम मध्‍यमत

 

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