दो दोस्त
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विनय सौरभ 
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दो दोस्त गए हैं बचपन के
अभी पहाड़ की तरफ़
एक आया है मुंबई से कई सालों बाद!
दोनों बचपन के दोस्त हैं
उनकी दोस्ती का आलम सब जानते हैं

मुंबई से आया दोस्त
उदास दिखता है इस बार
कहता है-
पच्चीस साल हो गए गाँव से निकले
विश्वास नहीं होता!

बरसों बाद मिले हैं दोनों
पर खामोश हैं
पता नहीं चलता, क्यों हैं

इस बार मुंबई की बातें नहीं हो रही हैं उनके बीच
लड़कियों की भी बातें नहीं हो रही हैं
और फ़िल्मों की तो बिल्कुल नहीं

शुरू के दिन याद आ रहे हैं
कितनी बातें करते थे दोनों
जब एक मुंबई से लौटता था
यहीं आते रहे मैट्रिक पास करने के दिनों से
यह जगह बहुत पसंद थी उन्हें

सखुआ के तब कितने पेड़ होते थे यहाँ
वह उदासी से चारों और देख रहा है
एक महुआ का पेड़ भी तो था यहाँ?
-कहाँ गया!

पेड़ कहीं नहीं जाते!
वह हमेशा बचे रहते हैं मन में!
अच्छा , तुम्हें याद है वह पेड़?
मैं पूछता हूं

वह धीरे से हंसता है-
एक बार हमने कितना महुआ चुना था!
क्या करते थे हम उसे चुनकर?
वह फीकी हंसी हंस रहा है
मुंबई की बातें नहीं हो रही हैं

फ़्लैट की किस्तें चुक गईं?
हाँ, चुक गई हैं-
कुछ रुक कर, बेहद ठंडी आवाज़ में कह रहा है
पर किस्तें चुक जाने की ख़ुशी
उसके चेहरे पर नहीं है

पहले तो हमेशा ही कहता था चिट्ठियों में
और मिलने पर भी
बस कैसे करके किस्तें ख़त्म हो जाएँ
अपना एक घर हो जाए मुंबई में बस!

सुंदर मौसम है
गर्मियों की यह शाम कितनी सुकून भरी है
पर कोई हवा है जो दोनों के बीच रुकी हुई है
दोनों चुप हैं, कोई कुछ नहीं कह रहा!

किसी का फ़ोन आया है मुंबई वाले दोस्त के पास
और उसने हां हूं में जवाब भर दिया है
बातों का लिफ़ाफ़ा
जैसे हवा उड़ा ले गई है अपने साथ
और खामोशी थोड़ी बारिश के बाद की
उमस की तरह फैली है आसपास

बेटा तो अब ग्यारह-बारह का हो गया होगा?
जैसे उसने देर से सुनी हो यह बात
चौंककर कहा है उसने-
हाँ बारह का! बारह का!

सोचता हूँ इस बार आया हूँ तो
घर की पुताई करा ही लूँ!
इतना बड़ा घर!
क्यों बनाया होगा इतना बड़ा घर पुरखों ने!
कितना मुश्किल है अब इनका साज संवार!!

वह बोल रहा है
एक छिपी हुई रुलाई भी उसमें शामिल है
धूल से सने घर में
उदासी भी साथ रहने चली आती है
उसमें सिर्फ़ जाले ही नहीं आते!
वह गाँव वाले अपने बड़े से घर की बात कर रहा है
मुंबई की बातें नहीं कर रहा है

हम इधर आकर कितनी सिगरेटें पीते थे!
तुम कभी-कभार अब भी सिगरेट पीते हो क्या?
मैं ना में सिर हिलाता हूँ
और कुछ नहीं कहता

इधर कितने पेड़ थे!
बेर की कितनी झाड़ियां होती थीं!
सालों बाद मिले हैं दोनों दोस्त
पहाड़ के नीचे बैठे हैं
और मुंबई की बातें नहीं हो रही हैं…