राकेश दुबे

भारत के राजनीतिक दल, गठबंधन और राजनीतिक दलों के प्रेरणा स्रोत तथाकथित सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन आज़ादी के 75 साल बाद भी देश में सामाजिक समरसता पैदा नहीं कर सके हैं। एक ट्रस्ट ने 569 गांवों में 98000 लोगों के बीच चार साल तक किए गए अध्ययन के बाद पाया कि दलित, भले ही वे हिन्दू हों, 90.2 प्रतिशत गांवों के मंदिरों में प्रवेश नहीं पा सकते; 54 प्रतिशत पब्लिक स्कूलों में दलित बच्चों को अन्य बच्चों से अलग कर मिड डे मील दिया जाता है और 54 प्रतिशत पंचायतों में दलित सरपंच और पंचायत सदस्यों के लिए अलग से कप और गिलास हैं।

सरकार कोई भी रही हो, प्रश्न भारत के संविधान का है। क्या सरकारों की प्राथमिकता बदल गई है? 7 अगस्त को जो घटा, वो तो और ज्यादा शर्मनाक है। दलित परिवारों ने अपने पीतल के बर्तन और जमा सिक्के इकट्ठा कर गलाये और एक हजार किलोग्राम का सिक्का बनाया, इसे एक ट्रक पर रखा गया था। इस पर एक-एक रुपये के 20 लाख सिक्के भी थे। इनके अतिरिक्त, बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर की प्रतिमा और संविधान की प्रतिकृति भी साथ में थी, इसे लेकर वे दिल्ली जाना चाहते थे। यह यात्रा गुजरात में मेहसाना और बनासकांठा तथा राजस्थान से तो गुजर गई, परन्तु 7 अगस्त की शाम राजस्थान-हरियाणा सीमा पर हरियाणा पुलिस ने इसे रोक दिया।

खास तौर से डिजाइन किया गया 1000 किलोग्राम वजन वाला सिक्का नए संसद भवन में रखे जाने के लिए राष्ट्रपति को सौंपने के इरादे से यह यात्रा निकली थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस सिक्के पर यह सवाल खुदा हुआ है कि ‘अस्पृश्यता-मुक्त भारत का 1847 का सपना क्या 2047 में वास्तविक होगा? बताया गया कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से इस सिक्का यात्रा को दिल्ली की तरफ न जाने देने का निर्देश है।

हरियाणा पुलिस वाले शालीन थे और उन लोगों ने भोजन और रात में ठहरने के इंतजाम के प्रस्ताव भी किए जिन्हें मना कर दिया गया। यात्रा के यात्री कोई दान मांगने दिल्ली नहीं जा रहे थे। वे तो यह पूछने जा रहे थे कि क्या अगले 25 साल में भी छुआछूत खत्म हो पाएगी या नहीं। देश में आज भी दलितों के लिए आजादी का कोई मतलब नहीं है, अगर उन्हें लक्ष्य कर की जा रही हिंसा का कोई अंत नहीं है?

1997 तक दलित हिंसा को लेकर प्रामाणिक आंकड़े गायब थे। पिछले 42 साल के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अनुमान इस तरह लगाया गया है- हत्याः 25947(दलित), 5336 (आदिवासी); बलात्कारः 54903 (दलित महिलाएं), 22004 (आदिवासी महिलाएं); पुलिस में दर्ज उत्पीड़न के मामलेः 1204665 (दलित), 211331 (आदिवासी)। मीडिया में छपी/दिखाई गई स्टोरीज भी संकेत देती हैं कि दलितों और आदिवासियों पर निर्मम हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या जाति और छुआछूत को जड़ से मिटाया जा सकता है? इसका एकमात्र प्रभावी रास्ता संविधान के प्रति निर्भीक निष्ठा है। भारत के राजनीतिक दल, गठबंधन और राजनीतिक दलों के प्रेरणा स्रोत तथाकथित सामाजिक सांस्कृतिक संगठन बरायेनाम गाल बजाते दिखते हैं।

याद कीजिये जाति भेद के खिलाफ डरबन में 2001 में हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दौरान भारत सरकार ने दावा किया कि भारत में कोई छुआछूत नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 और ‘आरक्षण’ के प्रावधान इस दावे के समर्थन में उद्धृत किए गए। और फिर भी इसी साल यानि 2022 में कर्नाटक सरकार ने छुआछूत मिटाने के लिए ‘विनय समरस्य योजना’ शुरू की। तमिलनाडु सरकार ने 500 से अधिक गांवों की सूची जारी की जहां छुआछूत की चिंताजनक प्रथा अब भी जारी है। साफ है कि छुआछूत अब भी है। भारत सरकार को प्राथमिकता के साथ इस पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।(मध्यमत)
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