राकेश दीवान

आखिर मजदूर-किसानों की किस्मत ‘बदलने’ वाले कानून राष्ट्रपति भवन की देहरी तक पहुंच ही गए। राज्यसभा में हुए हंगामे में खलनायक बनी सरकार और उससे भी बड़े खलनायक बने राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश नारायण सिंह ‘बिल’ पारित करवाने की हड़बड़ी में कुछ मामूली से बुनियादी सवालों तक को अनदेखा कर गए। यदि वे अपने पत्रकार के पूर्व-अवतार में होते तो रिपोर्टिंग के लिहाज से भी शायद इतनी मामूली सी चूक नहीं करते। मसलन- वर्ष 2016 के डॉ. आम्बेडकर के जन्म दिन 14 अप्रैल को घोषित मंडियों की बेहतरी की ‘ई-नाम’ योजना मौजूद होने के बावजूद कृषि-उत्पादन की बिक्री बढ़ाने के लिए लगभग उसी तर्ज के इस ताजा बिल को क्यों लाया गया?

यदि किसान को देशभर में कहीं भी अपना कृषि-उत्पाद बेचने की खातिर मंडियों को कमजोर किया जाना जरूरी ही था तो क्या बिहार के उन अनुभवों को नहीं देखा जाना चाहिए था जो 2006 में मंडी कानून की समाप्ति के बाद वहां हुए थे? प्रधानमंत्री समेत उनकी समूची केबिनेट किसानों की जिस मौजूदा आय को दुगनी करने की बात करते नहीं अघाते वह आखिर कितनी है? खुद उनके राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री किसानों की आय दुगुनी करने के लिए कम-से-कम एक दशक तक ‘सकल घरेलू उत्पाद’ यानि ‘जीडीपी’ का दो अंकों में रहना लाजिमी मानते हैं।

ऐसे में इन ताजा कानूनों से कैसे ‘जीडीपी’ कम-से-कम दस बना रह सकेगा? और सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण कि क्या इन कानूनों के आने से किसान-आत्माहत्याओं पर रोक लग जाएगी? या मजदूर काम बंद होने पर वापस अपने गांव-देहातों की ओर कूच नहीं करेंगे? क्या ये कानून सबका पेट भरने की कोई गारंटी देते हैं?  संसद के दोनों सदनों में इन और इन जैसी अनेक बातों को अनदेखा करके कानून बनवाने में जिस बात की सर्वाधिक अहमियत है, वह है सत्तारूढ भाजपा को मिला बहुमत।

इसी तरह का बहुमत पहले की अनेक सरकारों ने भी भोगा है और नतीजे में देश ने उनकी भांति-भांति की मनमानी झेली है। लोकतंत्र का यदि यही तौर-तरीका जारी रहा तो क्या हमारा मौजूदा ढांचा इसी तरह के बहुमत के बल पर आगे बढ़ सकेगा? लोकतंत्र ‘लोगों के लिए, लोगों की और लोगों के द्वारा’ की जाने वाली शासन प्रणाली मानी जाती है, लेकिन क्या हाल के किसानों-मजदूरों से जुड़े कानून बनाने में लोगों की सच्ची भागीदारी हो पाई? क्या इन कानूनों को पारित करने के पहले किसानों या मजदूरों के किसी संगठन, गुट या जमावड़े से कोई राय ली गई? यदि नहीं, तो फिर यह कैसे लोकतांत्रिक होगा?

एक भ्रम है कि राजनीतिक पार्टियां आम लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं और नतीजे में उनके द्वारा तय किए गए विधायक या सांसद अपनी पार्टियों के बहुमत के आधार पर सरकारें बनाते और उन्हें चलाते हैं। क्या सचमुच आम लोगों, नागरिकों की बात संसद या विधानसभाओं की मार्फत सत्ता तक पहुंच पाती है?

आजादी के तुरंत बाद देश को संविधान सौंपते हुए दिए गए डॉ. आम्बेडकर के भाषण और महात्मा गांधी के अंतिम पत्र पर गौर किया गया होता तो इस सिलसिले की कुछ जरूरी बातें साफ हो गई होतीं। मसलन गांधी जी ने अपने पत्र में कहा था कि लोकतंत्र हमारे सरीखे देश के लिए एक नई पद्धति है और इसे लागू करने के लिए उसकी तैयारी करनी होगी। आम्बेडकर ने तो साफ कर दिया था कि इस पद्धति में सारा दार-ओ-मदार लागू करने वालों पर ही होगा।

यानि यदि लोकतंत्र में बहुमत पाकर कोई सत्ता पर काबिज हो भी जाता है तो भी उसकी भलमनसाहत ही वह आखिरी पैमाना होगा जिसके दम पर लोकतंत्र सफल या असफल हो सकेगा। अब ऐसे में कोई राजनीतिक दल बहुमत जुगाड़कर सत्ता पर काबिज हो जाता है तो नागरिकों को उसकी भलमनसाहत पर ही भरोसा करना होगा। जाहिर है, इस तरीके में सरकार बनाने और चलाने में नागरिकों की भागीदारी लगभग नगण्य होगी।

नागरिकों की भागीदारी-मुक्त व्यवस्था की एक और बानगी औद्योगीकरण भी है। यहां काम करने वाले मजदूर अपनी समूची उत्पादन प्रक्रिया से आमतौर पर अनजान ही रहते हैं। वे अपने काम के अलावा अधिक-से-अधिक अपने आसपास के कामकाज की थोड़ी-बहुत जानकारी रखते हैं, लेकिन उन्हें अपने विशालकाय उद्योग की समूची उत्पादन-पद्धति के बारे में कोई अता-पता नहीं होता। उद्योगपति इस अज्ञान को पालते-पोसते हैं ताकि मजदूरों को एक-दूसरे की उत्पादन प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी न हो और वे एक-दूसरे से जुडकर संगठित ना हो पाएं।

यानि उत्पादक मजदूर बाजार के लिए काम करने वाली एक बड़ी मशीन के छोटे-छोटे कलपुर्जे भर बने रहें, उन्हें पूरी मशीन की समझ ना होने पाए। ध्यान से देखें तो यही प्रक्रिया कृषि में भी लागू करने की कोशिशें होती रही हैं। यहां भी बाजार की खातिर विपुल उत्पादन तो किया जाता है, लेकिन उस उत्पादन की वाजिब कीमत से लगाकर उसके उपयोग तक पर किसानों का कोई नियंत्रण नहीं रहता। वे अपनी भागीदारी छोड़कर लोकतंत्र में भी बाजार की मर्जी पर जीते-मरते हैं।

मार्क्सवादी लेखकों ने मीडिया और मनोरंजन को लेकर विस्तार से बताया है कि किस तरह औद्योगीकरण के पहले के समाजों में मनोरंजन सबकी भागीदारी का उपक्रम था और किस तरह धीरे-धीरे वह ‘दर्शक-परफार्मर’ या ‘श्रोता-गायक’ के द्वैत में तब्दील होता गया। एक समय ऐसा आया कि उपभोक्ता के रूप में दर्शक या श्रोता अपने मनोरंजन, ज्ञान में भागीदारी करने की बजाए केवल देखने और सुनने वाले की भूमिका में ही रह गया।

मनोरंजन और सूचनाओं के संसार से अपनी भागीदारी छोड़ने के परिणामस्वरूप नागरिक केवल ‘परोसे’ गए कार्यक्रमों का उपभोक्ता भर रह गया और उसकी मनमर्जी से हिलने-डुलने लगा। जाहिर है, उद्योगों, कृषि और मनोरंजन या सूचनाओं के संसार में कुल जमा उपभोक्ता की हैसियत से बचे नागरिक अपने भविष्य को लेकर भी सत्ता या उसके मालिकों की मर्जी के भरोसे हो गए हैं। राजनीति, उद्योग, कृषि, मनोरंजन और जीवन के लिए जरूरी ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में हुआ व लगातार बढ़ता नागरिकों का यह अलगाव आखिर एक केन्द्रीकरण को ही जन्म देगा। सात दशकों की आजादी के बाद हमारे समाज में यह अलगाव अब अपने चरम पर है।

इस अलगाव के कारण लोकतांत्रिक संस्थाओं की बदहाली और सत्ता व पूंजी की बढ़ती ताकत नागरिकों को नाकारा बनाए रखती है। नतीजे में देश की संसद दो दिन में ऐसे 15 बिल पारित कर देती है जिन पर देश की तीन चौथाई आबादी का जीवन टिका हुआ है और जिन्हें लेकर नागरिक देशभर में आंदोलनरत हैं। ऐसे में सवाल है कि सत्ता की इस फलती-फैलती ताकत को कैसे काबू में किया जाए? जाहिर है, अव्वल तो हमें राजनैतिक प्रक्रियाओं से मुंह बिचकाने की बजाए उनमें भागीदार होना पडेगा।

लोकप्रिय मान्यता है कि राजनीति केवल सत्ता पर चढ़ने-उतरने की कसरत भर होती है, लेकिन ध्यान दें तो अपने आसपास की तमाम जीवनोपयोगी बातें राजनीति के दायरे में शामिल हैं। पर इससे भी जरूरी है अपने-अपने स्तर पर, अपने-अपने दायरे में सक्रिय रहना। अलगाव की विशालकाय राजनीति असल में उद्योग, कृषि, मनोरंजन और मीडिया के अलगाव से पैदा होती है। क्या हम अपनी भागीदारी से ही उद्योग, कृषि, मनोरंजन आदि का कोई उपक्रम खड़ा कर सकते हैं? ताकि राजनीति पर अपना भी कोई जोर हो?