गिरीश उपाध्‍याय

रविवार को एक बहुत खतरनाक खबर देखने में आई। खबर उस धार्मिक नगरी उज्‍जैन की है जहां दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक समागमों में से एक सिंहस्‍थ कुंभ अभी हाल ही में संपन्‍न हुआ है। और खबर यह है कि उज्‍जैन के 56 मदरसों ने सरकार की ओर से दिए जाने वाले मिड-डे मील को लेने से इनकार कर दिया है। कारण यह बताया गया है कि पहले इन मदरसों को एक खास समूह द्वारा पकाया गया भोजन सप्‍लाई किया जाता था, लेकिन नया ठेका किसी और समूह को दे दिया गया है। नए समूह द्वारा पकाया गया भोजन मदरसों को मंजूर नहीं है।

मदरसा शिक्षण समिति के अध्‍यक्ष अशफाकउद्दीन के हवाले से इस मामले में जो प्रतिक्रिया दी गई है उसके मुताबिक- ‘’मदरसों के लिए पूर्व में समाज के समूह की ओर से भोजन पकाया जाता था। नया ठेका होने के बाद इसे समाप्‍त कर दिया गया है। हमारी मांग है कि इसे वापस शुरू किया जाए। अगर ऐसा संभव नहीं है, तो मदरसों के लिए अलग समूह बनाया जाए।‘’

मदरसों का कहना है कि जिन समूहों को भोजन बनाने का ठेका दिया गया है, उनके यहां पकाया हुआ भोजन लेने से भविष्‍य में विवाद हो सकता है, इसलिए उनके लिए अलग व्‍यवस्‍था की जाए। विवाद के चलते एक अगस्‍त से मदरसों में भोजन नहीं पहुंचा है।

जो बातें खबरों में नहीं छपी हैं, वे तरह तरह की चर्चाओं के रूप में फैल रही हैं। एक चर्चा यह भी है कि मदरसों ने धर्म विशेष की संस्‍था को भोजन बनाने का ठेका दिए जाने के कारण भोजन लेने से इनकार किया है। यह चर्चा इसलिए भी उठी है क्‍योंकि इससे पहले 2010 में जब यह काम इस्‍कॉन मंदिर सोसायटी को दिया गया था तो मदरसों ने यह कहते हुए ऐतराज किया था कि चूंकि यह भोजन भगवान को भोग लगाए जाने के बाद वितरित किया जाता है, इसलिए वे उसे स्‍वीकार नहीं कर सकते।

उस समय प्रशासन ने विवाद खत्‍म करने के लिए रास्‍ता निकाला और मदरसों की ही एक समिति को यह काम दे दिया। लेकिन अब इस्‍कॉन ने इस काम से हाथ खींच लिए। इसलिए टेंडर बुलाकर दो समूहों को नए सिरे से यह ठेका दिया गया है। इस पर मदरसे कह रहे हैं कि उनके यहां पढ़ने वाले बच्‍चों के भोजन की आदतें अलग हैं, इसलिए वे तो अपना भोजन अलग ही पकाएंगे। टेंडर की शर्तों के हिसाब से ऐसा करना प्रशासन के लिए मुश्किल है, इसलिए मामला फंस गया है और कुछ लोगों को राजनीति करने का अवसर मिल गया।

खबरों के अनुसार मदरसा समिति ने इस मामले में जिले के प्रभारी कलेक्‍टर से चर्चा भी की। कलेक्‍टर का कहना है कि- ‘’जो समूह भोजन उपलब्‍ध करवा रहा है, वह किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है।‘’ यानी मिड डे मील के बहिष्‍कार की यह स्थिति कहीं न कहीं भोजन बनाने की प्रक्रिया को धर्म से जोड़े जाने के कारण ही पैदा हुई है।

इस तरह का विरोध औचित्‍यहीन तो है ही, समाज में खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला भी है। क्‍या अब समाज में इस स्‍तर तक जाकर बातों को धर्म से जोड़ा जाएगा?  मिड डे मील की व्‍यवस्‍था बच्‍चों को स्‍कूल में भोजन उपलब्‍ध कराने के लिए है। इसमें देखने वाली बात सिर्फ और सिर्फ यह होनी चाहिए कि वह भोजन खाने योग्‍य और पोषक है या नहीं? इस बात से क्‍या फर्क पड़ना चाहिए कि उसे रामलाल ने बनाया है या रईस मोहम्‍मद ने या फिर अलेक्‍जेंडर ने। और यह क्‍या बात हुई कि भोजन किसी देवता को प्रसाद के रूप में चढ़ाया इसलिए नहीं लेंगे। उपासना स्‍थल में वह सामग्री पवित्र मानकर ही अर्पित की गई होगी, उसमें कोई जहर तो नहीं मिला दिया गया?

यदि हम ऐसे कुतर्कों पर काम करने लगें तो बात कहां जाकर खत्‍म होगी कहना मुश्किल है। और खत्‍म होगी भी या नहीं मुझे तो इसमें भी संदेह है। क्‍या हम बच्‍चों को दूध यह जानने के बाद पिलाएंगे कि वह गाय किसी राम के आंगन में पली है या रहीम के? क्‍या अनाज की बोरियां यह जानने के बाद उठाई जाएंगी कि वह किसके खेत में पैदा हुआ है? क्‍या तन पर कपड़ा यह जानने के बाद पहना जाएगा कि उसे सिला किसने है? बीमार बच्‍चे का इलाज किससे करवाना है, इसका फैसला भी क्‍या हम डॉक्‍टर का धर्म देखकर करेंगे? समाज को यह हो क्‍या रहा है? आखिर धर्म के नाम पर की जाने वाली यह टुच्‍ची राजनीति समाज कब तक स्‍वीकार करता रहेगा?

खबरों से जो इशारे मिल रहे हैं, वे मध्‍यप्रदेश जैसे शांत प्रदेश की फिजा में जहर घोलने वाले हैं। सरकार को तत्‍काल स्थिति स्‍पष्‍ट करनी चाहिए। जो भी संस्‍थाएं और विभाग इस मामले को निपटाने के लिए जिम्‍मेदार हों, उन्‍हें सख्‍त ताकीद की जानी चाहिए कि इसे जल्‍द से जल्‍द हल करें और बात को आगे न बढ़ने दें।

सिंहस्‍थ के दौरान उज्‍जैन में साधु संतों के अखाड़ों में चलने वाले अन्‍न क्षेत्रों में जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर कोई भेद नहीं हुआ। वैचारिक कुंभ में विश्‍वबंधुत्‍व की बातें हुईं। अब उसी भावना को जमीन पर उतारने की असली परीक्षा है। इसमें असफल होने की इजाजत भी नहीं है।