राकेश अचल

आज आपको एक के साथ एक खबर यानि दो खबरें एक साथ पढ़ना होंगी। ये दोनों खबरें देश में लोकतंत्र के भावी चेहरे की झलक देने वाली हैं। पहली खबर बिहार की है। यहां की विधानसभा में पुलिस ने विधायकों को अपराधियों की तरह घसीटकर सदन के बाहर निकाला और दूसरी खबर दिल्ली की है जहां राज्य विधानसभा के पर कतरने के लिए राज्य सभा में एक विधेयक को पारित कर दिया गया। लोकसभा में ये विधेयक पहले ही पारित किया जा चुका है।

बिहार विधानसभा में जो हुआ वो सब विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर हुआ। विपक्ष विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक के विरोध में सभापति को घेरे हुए था। सभापति ने सदन स्थगित करने या बेकाबू विधायकों को रोकने के दीगर उपायों का इस्तेमाल करने के बजाय सीधे पुलिस को सदन के अंदर बुलाकर विधायकों की लू उतरवा दी। जिस पुलिस को विचाराधीन विधेयक और ताकतवर बनाना चाहता है उसके पारित होने से पहले ही पुलिस के बल पर विपक्षी विधायकों को घसीटकर सदन के बाहर कर दिया गया। विधायक सदन के भीतर पिटे तो उनके समर्थक सदन के बाहर। लाठी के बल पर सरकार चलाने की ये कोशिश उस बिहार में हुई जिसे सुशासन बाबू चला रहे हैं।

देश में जहाँ भी भाजपा की या भाजपा समर्थित सरकारें हैं विशेष सशस्त्र बल को और ज्यादा मजबूत बनाने के क़ानून बनाने में जुटी हुयी है, ताकि लोगों को बिना वारंट के भी गिरफ्तार कर आतंक का राज चला सकें। इस तरह का क़ानून सबसे पहले उत्तर प्रदेश में बना और फिर बाद में इस तरह के कानून बनाने की होड़ लग गयी। बिहार में ये कानून बनने से पहले ही अपना असर दिखाने लगा। किसी भी सदन में पुलिस को बुलाकर विधायकों की धुनाई करने की ये पहली और आखरी घटना नहीं है। इससे पहले भी ऐसा हुआ है और जिस तरह से देश में लोकतंत्र की परवरिश पिछले कुछ वर्षों से की जा रही है उससे लगता है कि ये सिलसिला थमने वाला नहीं है।

बिहार लोकतंत्र का हिमायती प्रदेश रहा है। इसी जमीन पर देश की राजनीति को साम्प्रदायिकता के रंग में रंगने के लिए शुरू किये गए अश्वमेघ रथ को रोका गया था। इसी बिहार की धरती से इंदिरा गाँधी के आपातकाल को चुनौती देने वाला देशव्यापी आंदोलन शुरू हुआ था और इसी बिहार में विधायकों की पिटाई का भी श्रीगणेश भी हुआ है। लगता है कि अब बिहार की मिटटी का डीएनए भी बदल रहा है। यहाँ भी अब साम्प्रदायिक और अधिनायकवाद को प्रश्रय देने की स्थितियां बनने लगी हैं।

अब आइये दिल्ली की ओर चलते हैं। यहां राज्य सभा ने एनसीटी विधेयक पारित कर दिया है। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार (संशोधन) विधेयक, (जीएनसीटीडी) 2021 बिल पारित होने से उप राज्यपाल को और अधिक शक्तियां प्राप्त हो गई हैं। यह विधेयक सोमवार को लोकसभा से पारित हुआ था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए दुखद दिन बताया है। उन्होंने ट्वीट किया, ‘राज्यसभा ने जीएनसीटीडी विधेयक पारित किया। भारतीय लोकतंत्र के लिए दुखद दिन। लोगों को सत्ता दोबारा सौंपने के लिए संघर्ष करते रहेंगे। जो भी अड़चनें आएंगी हम अच्छा काम करते रहेंगे। काम न रुकेगा, न धीमा होगा।’

आपको याद होगा कि केजरवाल की पार्टी आप भी अखिल भारत पर राज करने के लिए शुरू किये गए अश्वमेघ यज्ञ में एक सबसे बड़ी बाधा साबित हुई है। आप ने एक बार नहीं बल्कि दो बार महाबली पार्टी के रथ को दिल्ली में ही रोककर दिखाया है। महाबली आप का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाए सो उन्होंने दिल्ली की पहले से आधी-अधूरी विधानसभा की ताकत को और कम करने के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथों में और ताकत दे दी। अरे भाई देश को आजाद हुए 75 साल होने को हैं, ऐसे में आप दिल्ली को किसी लेफ्टिनेंट के सहारे क्यों चलाना चाहते हैं? दिल्ली को पूर्ण संप्रभु विधानसभा क्यों नहीं देते?

विधानसभाओं को ही नहीं अपितु देश की संसद को भी कमजोर करने के इस अभियान को कहीं न कहीं तो रोकना होगा। राज्य सभा के पिछले सत्र में उपसभापति ने जिस तरीके से तीन विधेयक ध्वनिमत से पारित कराये थे वो सब संसदीय इतिहास में दर्ज है। इसे आप आजादी के बाद का देश का नया इतिहास कह सकते हैं। ऐसे ही नए इतिहास का एक अध्याय इंदिरा गाँधी ने देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले से निपटने के लिए आपातकाल लगाकर लिखा था। ये नया इतिहास हमारे देश की नयी पीढ़ी को कौन से लोकतंत्र का परिचय करने वाला है ?

दुर्भाग्य ये है कि ये सब घटनाएं तब हो रहीं हैं जब देश में आजादी के अमृत महोत्सव का श्रीगणेश हो चुका है। क्या पचहत्तर वर्ष की यात्रा के बाद हमारी आजादी का यही हासिल है कि विधायक सदन में पिटें और विधानसभाओं की शक्तियां किसी नौकरशाह के हाथों में सौंप दी जाएँ? मेरे ख्याल से हमारी स्वाधीनता की यात्रा का ये सुफल नहीं है। ये सब लोकतंत्र के लिए किये गए हमारे संघर्षों और बलिदानों का अपमान है। इस अपमान का बदला लेने की नहीं बल्कि इसे रोकने की आवश्यकता है। लोकतंत्र का सम्मान करना एक बात है और उसे शक्तिशाली बनाना दूसरी बात।

देश में पिछले कुछ दशकों से राजनीति में जिस तेजी के साथ मूल्‍यहीनता बढ़ी है उसकी वजह से सब कोई, किसी से डरने के लिए तैयार नहीं है। लोकतंत्र के तीनों और कथित रूप से चारों खम्भे कंधा डालते दिखाई दे रहे हैं। सबकी कोशिश एक-दूसरे के अधिकार के क्षेत्र में अतिक्रमण करने की है। न्यायपालिका कार्यपालिका को पंगु करना चाहती है तो कार्यपालिका न्यायपालिका की टांग तोड़ने में लगी है और विधायिका तो इस सबमें, सबसे आगे हैं। चौथा और अदृश्य खम्भा प्रेस सत्ता प्रतिष्‍ठान की गोदी में बैठा है, उसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने दायित्वों का कोई भान ही नहीं है।

दरअसल जब मैं ऐसे मुद्दों पर लिखता हूँ तो कभी-कभी अतिरेक की ओर बढ़ जाता हूँ। मेरा ये अतिरेक उसी जमीन से आता है जिस जमीन पर ये सब प्रहसन चल रहे हैं। आखिर हम किसे दोष दें? आम जनता को, विपक्ष को, बुद्धिजीवियों को या न्यायपालिका को? मेरे ख्याल से इस संक्रमणकाल में हम सब दोषी हैं, इसलिए हम किसी को दोष नहीं दे सकते। हम सभी को इस अपराध की सजा मिलना चाहिए। हम आज न जागे तो देख लीजियेगा की ये सजा हम सबको मिलेगी और समय ये सजा देगा। आजादी का अमृत महोत्‍सव मनाकर हम इस अपराध को छिपा नहीं सकते।(मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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