आकाश शुक्‍ला

क्या नई शिक्षा नीति, शिक्षा का अधिकार का संवैधानिक संशोधन, आरटीई कानून सिर्फ तालियां पीटने के लिए ही बनते हैं।

यदि ऐसा है तो हम कब तक बस तालियां पीटते रहेंगे और निशुल्क शिक्षा की अवधारणा घुट घुट कर मरती रहेगी। शिक्षा से संबंधित किसी भी सुधार, चाहे वह नई शिक्षा नीति क्यों ना हो, का स्वागत तालियां पीट कर करना और उसका गुणगान करना बहुत अच्छा लगता है, परंतु वास्तविकता के धरातल पर अपने देश के विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा प्रदान करना बहुत अलग बात है। आजादी के 73 वर्षों का सफर हो जाने पर भी, किसी भी देश को आगे बढ़ने के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधा शिक्षा, यदि कोई देश अपने नागरिकों को निशुल्क नहीं दे सकता तो, इसका कारण नीति की असफलता नहीं है नीयत पर शक है।

इसके पूर्व में भी 1968 में एवं 1986 में शिक्षा नीति आई थी। 1986 की शिक्षा नीति में 1992 में कुछ परिवर्तन भी किए गए थे। परंतु उन नीतियों की कुछ बातें को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश बातों पर आज तक अमल नहीं किया गया है। आज भी उन नीतियों में जीडीपी का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की बात का पालन नहीं किया जाता है। जब तक देश में नीतियां बनाने के साथ-साथ उन नीतियों को लागू करने के लिए बजट में दिल खोलकर प्रावधान नहीं करेंगे और उन नीतियों को लागू करने के लिए पर्याप्त कानून नहीं बनाएंगे तब तक ऐसी नीतियां आती-जाती रहेंगी परंतु उच्चस्तरीय और निशुल्क शिक्षा आम जनता की पहुंच से दूर रहेगी।

नई शिक्षा नीति में बहुत सारी अच्छी बातें है, जैसे-
– स्कूली शिक्षा में 100 फीसदी जीईआर और उच्च शिक्षा में 50 फीसदी जीईआर हासिल करना।
– जरूरत के हिसाब से प्रौद्योगिकी पर जोर।
– उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में विषयों की विविधता के साथ पाठ्यक्रम के बीच में समानीकरण के साथ नामांकन और निकास की अनुमति।
– ठोस अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देने की पर्याप्त व्यवस्था।
– बहुभाषावाद और मातृभाषा को बढ़ावा देना।
– स्कूली शिक्षा में व्यवसायिक शिक्षा को शामिल करना।
– अध्यापकों के शिक्षण के लिए नया राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा 2021 तैयार किए जाने संबंधी प्रावधान।

परंतु इसके साथ साथ कुछ बातें अस्पष्ट हैं और कुछ सुधारों पर नई शिक्षा नीति मौन है जैसे-

कम से कम पांचवी कक्षा तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई कराने संबंधी प्रावधान। क्या यह प्रावधान लागू होने के बाद शासकीय स्कूल और निजी स्कूलों पर यह प्रावधान समान रूप से लागू हो पाएंगे? आरटीई कानून के तरह ही इसमें भी भेदभावपूर्ण व्यवहार होगा जैसे शासकीय स्कूलों में निशुल्क शिक्षा और प्राइवेट स्कूलों में केवल 25 फीसदी छात्रों के लिए निशुल्क शिक्षा, और इसमें भी कुछ स्कूलों को छूट दी गई है। यदि प्राइवेट स्कूलों को मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाने से मुक्त रखा जाएगा तो शासकीय स्कूलों में उपस्थिति इसी कारण और भी कम होने की अधिक संभावना है। क्योंकि हमारे वर्तमान परिवेश और विदेशों में नौकरी और पढ़ाई के आकर्षण के कारण पालकों की प्राथमिकता अंग्रेजी माध्यम के स्कूल हैं।

नई शिक्षा नीति में बच्चों को 3 वर्ष से ही शिक्षा देने के लिए आंगनवाड़ी और प्रीस्कूलिंग को मान्यता दी गई है। 3 वर्ष के नौनिहालों को शिक्षा के लिए स्कूल भेजना उनका बचपन खत्म करना है। नई शिक्षा नीति में यदि बच्चों की शिक्षा की शुरुआत करने की आयु 5 से 7 वर्ष रहती तो अच्छा रहता। फिनलैंड जैसे अच्छी शिक्षा देने वाले देश में 7 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर ही बच्चों को स्कूल में दाखिला मिलता है।

एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य विशिष्ट श्रेणियों से जुड़े छात्रों की योग्यता को प्रोत्साहित करने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने और उनको बढ़ावा देने संबंधी प्रावधान करके एकमात्र सामान्य वर्ग को इससे वंचित रखना एक नई सामाजिक दूरी पैदा करेगा। निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तो सभी को समान रूप से दी जाना चाहिए, यह विभेद कम से कम शिक्षा में तो खत्म कर देना चाहिए था।

शिक्षा के क्षेत्र में तो कम से कम आरक्षण जैसे प्रावधान नहीं होना चाहिए। योग्य शिक्षक चाहे वह किसी भी जाति, धर्म और समाज का हो, जो पढ़ाने में रुचि रखता हो, उसकी योग्यता के आधार पर शिक्षक के रूप में नियुक्ति होना चाहिए।

शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापकों का वेतन आकर्षक होना चाहिए जिससे कि योग्य व्यक्ति इस क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा आएं और अच्छी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र निर्माण में सहयोग करें।

पूर्व में भी संविधान के अनुच्छेद 21 क द्वारा 6 से 14 वर्ष के बालकों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा संबंधी 86 वां संवैधानिक संशोधन 2002 में लागू किया गया था। परंतु 2009 में आरटीई कानून बनाते समय मात्र शासकीय स्कूलों में निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने संबंधी प्रावधान लागू हुए और निजी शिक्षण संस्थानों में मात्र 25 प्रतिशत छात्र-छात्राओं को निशुल्क शिक्षा दिए जाने संबंधी प्रावधान किए गए। और कुछ स्कूलों को तो इसमें भी धार्मिक आधार पर छूट दी गई। जिसके कारण संविधान में बच्‍चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के प्रावधान होने के बाद भी शिक्षा के व्यवसायीकरण को भरपूर बढ़ावा मिला। हमारे देश में शिक्षा को व्यवसाय के रूप में किसी भी नियम और कानून में मान्यता नहीं है, परंतु संवैधानिक प्रावधान होने के बाद भी शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण को फलने फूलने के लिए भरपूर अवसर प्रदान किए जाते हैं, जिसके कारण ही शिक्षा का व्यवसायीकरण चरम पर है।

जब तक सभी निजी एवं शासकीय शिक्षा संस्थानों में निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान किए जाने संबंधी प्रावधान नहीं किये जाते, तब तक आरटीई कानून, संविधान में निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के प्रावधान होने और नई शिक्षा नीति आने के बावजूद, शिक्षा में सुधार की उम्मीद दूर दूर तक दिखाई नहीं देती। और शायद तब तक हमारा, सरकार की शिक्षा नीति और शिक्षा के संबंध में बनाए कानूनों पर ताली पीटना व्यर्थ है।

यदि सरकार नई शिक्षा नीति लागू करने के लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान करे और इसे लागू करने के लिए नई शिक्षा नीति के अनुरूप कानून बनाए तो ही शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे सुधारात्मक परिणाम आएंगे।