अजय बोकिल

अफगानिस्तान पर इस्लामिक कट्टरपंथी तालिबान के फिर से कब्जे के बाद इस देश का भविष्य क्या होगा? इससे भी बड़ा सवाल यह कि इस पूरे घटनाक्रम का, जो अप्रत्याशित भले न हो, लेकिन चौंकाने वाला जरूर है, भारत के सदंर्भ में सबक क्या है? हम तालिबान का अभी भी विरोध कर रहे हैं, लेकिन काबुल पर उनका कब्जा जमीनी हकीकत है। तालिबान का खूंखार शासन फिर पुराने रूप में लौटेगा या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। लेकिन उसका चेहरा बहुत बदला हुआ होगा, इसकी संभावना भी कम ही है।

उधर राष्ट्रपति जो बाइडेन अफगानिस्तान में अमेरिका की ‘हार’ को जायज ठहराने वाले बचकाने बयान दे रहे हैं तो प्रतिद्वंद्वी रूस और चीन एक अस्थिर देश में अपनी नई भू-राजनीतिक और आर्थिक संभावनाएं तलाश रहे हैं, जिसका सीधा असर दक्षिण एशिया और खासकर भारत पर असर होगा। सवाल यह भी है कि दुनिया भर में खुद को लोकतंत्र, मुक्त अर्थव्यवस्था और मानवाधिकार का पैरोकार मानने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका पर किसी देश को कितना भरोसा करना चाहिए? क्या दोस्तों के लिए जान लड़ाने का युग अब बीत गया है?

वैसे अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और आपसी मारकाट नई बात नहीं है। क्योंकि जमीन से‍ घिरा यह समूचा देश अलग-अलग जातीय नस्लों, कबीलो और समुदायो में बंटा हुआ है। यूरोप और मध्य एशिया से भारत आने वाले हमलावरों का यह परिचित मार्ग रहा है। हम अफगानिस्तान को आर्य संस्कृति का केन्द्र भी मानते हैं। जानकारों के अनुसार ‘अफगान’ शब्द प्राचीन संस्कृत और अवेस्ता भाषा के ‘अश्वकायन’ (घुड़सवार) शब्द का ही अपभ्रंश है। लेकिन ज्ञात इतिहास में करीब सवा दो हजार साल पहले तक अफगानिस्तान में पारसी धर्म का प्रभाव था, जिसे सिंकदर ने हमला कर ध्वस्त किया। बाद में ‍सनातन हिंदू धर्म, फिर बौद्ध धर्म का भी अफगानिस्तान में बोलबाला रहा।

हिंदू राज्य वहां इस्लाम के आगमन के कई साल बाद तक कायम था। आखिरी हिंदू राजा जयपालदेव था,‍ जिसे 1001 में महमूद गजनी ने हराया। हिंदू राजाओं का वंश हिंदू शाही कहलाता था। हालांकि हिंदू शाही का संपूर्ण पतन तेरहवीं सदी में हुआ। हिंदू शाही राजा ब्राह्मण थे। मोहयाल, बाली उपनाम वाले इन्हीं के वंशज माने जाते हैं। तेरहवीं सदी तक अधिकांश अफगानियों ने इस्लाम कबूल कर लिया। आज वहां 70 फीसदी सुन्नी, 29 फीसदी शिया मुसलमान हैं। नस्ली आधार पर देखें तो अफगानिस्तान में 42 फीसदी पश्तून (पठान), 27 फीसदी ताजिक तथा बाकी हजारा, उज्बेक, तुर्कमान व बलूच आदि हैं।

तालिबान मुख्य रूप से पश्तून सुन्नी हैं, जिनकी बाकी समुदायों से ज्यादा नहीं बनती। लेकिन ये सत्ता के मुख्य दावेदार हैं। पश्तून भी कट्टर इस्लामिक जैसे कि तालिबान या अन्य संगठन तथा उदारवादी पश्तूनों में बंटे हैं, जो बीस साल से सत्ता में थे। वैसे पश्तूनों की निर्द्वंद्व सत्ता को गैर पश्तूनों ने कभी स्वीकार नहीं किया। इसलिए तालिबान भी पिछले शासनकाल में समूचे अफगानिस्तान पर काबिज नहीं हो पाए थे। इस बार भी ऐसा होगा, इसमें संदेह है, क्योंकि सत्ता का खेल तो अभी शुरू हुआ है।

सत्ता के लिए मारकाट और तख्तापलट अफगानिस्तान में नया नहीं है। वहां व्यक्तियों के साथ शासन का स्वरूप भी बदलता रहता है। इसका बड़ा कारण पड़ोसी देशों की अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में रुचि भी है। लेकिन बाहरी ताकतें चाहे वो ब्रिटेन हो, रूस हो अमेरिका, यहां आकर खाली हाथ ही लौटी हैं। फिर भी प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति से लेकर 1973 तक अफगानिस्तान में राजशाही के दौरान मोटे तौर पर शांति रही। सामाजिक दृष्टि से भी वो सुधारवाद का दौर था। लेकिन राजा जहीर शाह का उनके चचेरे भाई मोहम्मद दाउद खान ने ही तत्कालीन सोवियत रूस की शह पर तख्ता पलट कर खुद सत्ता हाथ में ले ली।

यह सत्तांतरण पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान (पीडीपीए) के झंडे तले हुआ। वो दौर दुनिया में रूस और अमेरिका के शीत युद्ध का था। पाकिस्तान और अमेरिका को रूस की दखलंदाजी नागवार गुजरी। उन्होंने दाउद के खिलाफ दूसरे इस्लामिक कट्टरपंथी गुटों को शह देना शुरू किया। उधर पीडीपीए के नेताओं में भी कुर्सी को लेकर भारी खींचतान चलती रही। नतीजतन 1979 में सोवियत रूस ने सीधे अपनी फौज अफगानिस्तान में उतार दी और अपने पट्ठों को तख्त पर बिठाया, हटाया। दूसरी तरफ अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों के प्रभाव को खत्म करने अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और पाक की आईएसआई ने इस्लामिक लड़ाकों को गोलबंद करना शुरू किया।

उन्हीं दिनों अफगानिस्तान में बिन लादेन के नेतृत्व में ‘अल कायदा’ के लड़ाके भी घुसे। देश में ‘अफगान-अरब’ एकता का नारा दिया गया। इस बीच रूस में कम्युनिस्टों का पतन हो गया। रूसी फौजें खाली हाथ वापस लौट गईं। उसके बाद अफगानिस्तान में कट्टरपंथी इस्लामिक गुटों में ही आपसी सत्ता संघर्ष शुरू गया। जिसमें अंतिम विजय 1996 में तालिबान की हुई, जिसे पाकिस्तान और सउदी अरब ने तैयार किया था। आपसी खून खराबे के बाद मुजाहिदीनों ने रूस समर्थित राष्ट्रपति नजीबुद्दौला को सरे आम फांसी पर लटकाकर पीडीपीए के राज को खत्म किया। इस अवधि में करीब 4 लाख अफगान मारे गए।

अब तालिबान के आगे अफगानिस्तान की प्रशिक्षित फौज भी जिस तरह डर कर भाग खड़ी हुई, वह भी विचारणीय है। वो ये कि सेना हथियार से भी ज्यादा मनोबल और मोटीवेशन से लड़ती है। अफगान सेना के पास यही नहीं था। आम अफगानी भी कहीं लड़ते नहीं दिखे। याद करें कि बंगला देश को भारतीय सेना इसलिए भी आजाद करा पाई थी कि वहां के स्थानीय लोगों ने हमारी सेना का पूरा साथ दिया था।

9/11 को न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिका ‘अल कायदा’ के पीछे पड़ गया। उसने तालिबान सरकार से अल कायदा नेता ओसामा बिन लादेन को सौंपने के लिए कहा। तालिबान ने अमेरिका से सबूत मांगे। बिन लादेन धीरे से पाकिस्तान चला गया। लेकिन अमेरिका ने तालिबान को आतंक की पनाहगाह मानकर उसके सत्ता से हटाने के लिए नाटो के तत्वावधान में व्यापक फौजी अभियान शुरू किया। इस बीच भारत ने तालिबान सरकार से सम्बन्ध तोड़ लिए थे। कंधार अपहरण कांड भी उसी दौरान हुआ। बदले में हमे कश्मीरी आंतकी छोडने पड़े।

अमेरिका के ‍इस अभियान में तालिबान विरोधी कई इस्लामिक गुट शामिल हुए। नतीजा यह हुआ कि तालिबान के कब्जे से काबुल मुक्त हुआ और एक लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना हुई। बदलाव और आधुनिकता की बयार बहने लगी। हालांकि जो सरकार बनी, वो भी भ्रष्ट और अमेरिका के दम पर ही टिकी थी। उधर तालिबान और आतंकी गुट सत्ता से हटे, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुए। देश में एक वर्ग और पाकिस्तान का पूरा समर्थन उन्हें मिलता रहा। वो जब-तब आतंकी हमलों को अंजाम देते रहे।

लेकिन खरबो डॉलर खर्च करने, साढ़े तीन लाख अफगानी फौज को ट्रेनिंग देने, भारत जैसे देशों द्वारा निर्माण कार्यों में मदद करने के बाद भी अंतत: अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपना हाथ खींचने का फैसला किया। उसने उस तालिबान से ही समझौता कर लिया, जिसे निपटाने के लिए इतना बड़ा दांव खेला गया था। इसमें मूर्ख वो अफगानी गुट, लोग और वो देश बने, जो यह मानकर चल रहे थे कि अफगानिस्तान में अपेक्षाकृत अमन और प्रगति का दौर लंबा चलने वाला है।

इस पूरे घटनाक्रम में भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि अमेरिका के बहुत करीब जाना भी समझदारी नहीं है। वह किसी भी देश की मदद तभी तक करता है, जब तक उसका मतलब सिद्ध हो। वो कब पल्ला झाड़ के आपको गड्ढे में धकेल चलता बनेगा, कह नहीं सकते। अफगानिस्तान मामले में अमेरिका की नीति की वहां भी कड़ी आलोचना हो रही है। जिस बाइडेन से लोगों को ट्रम्प की विवादास्पद नीतियों को पलटने की अपेक्षा थी, वो आज ठगे से हैं। इधर हालत यह है कि फिलीस्तीनियों की आजादी के संघर्ष में साथ देने की बात करने वाले कट्टरपं‍थी तालिबान की खुलकर आलोचना भी नहीं कर पा रहे हैं, और जो धर्म को ही राष्ट्र का पर्याय मानते रहे हैं वो तालिबान को गाली देते हुए भी मन ही मन आत्मावलोकन कर रहे हैं।

सवाल यह है कि भारत को ऐसे में क्या करना चाहिए? अफगानों से अपनी पुरानी दोस्ती की दुहाई देते हुए भगवान भरोसे बैठना चाहिए या फिर बदली हुई परिस्थितियों में उस व्यावहारिक विदेश नीति पर चलना चाहिए कि कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। तमाम मदद और सहानुभूति के बाद भी हम अफगानों की किस्मत नहीं बदल सकते। यह लड़ाई उन्हीं को लड़नी होगी। हो सकता है कि तालिबानी सरकार के खिलाफ वहां आंतरिक बगावत शुरू हो। लेकिन इसके लिए सही नेतृत्व और पर्याप्त विदेशी मदद जरूरी है।

इक्कीसवीं सदी की दुनिया बीसवीं सदी से अलग इस मायने में भी है कि अब सैनिक संधियों अथवा सैन्य विस्तारवाद से ज्यादा अहम आर्थिक और भू राजनीतिक‍ हित हैं। अपने देश का हित किसमें है, यह देखने-समझने में है। या यूं कहें कि आज दुनिया पहले से ज्यादा स्वार्थी हो गई है। शायद इसीलिए तालिबान को नापसंद करते हुए भी पड़ोसी रूस, चीन और ईरान ने ‘व्यावहारिक स्टैंड’ लेना शुरू कर दिया है। उनके लिए तालिबान की जीत से ज्यादा खुशी अमेरिका की हार की है।

और दोहरा खेल खेलने में पाकिस्तान का तो कोई सानी नहीं है। इसीलिए तालिबान की जीत को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की (विदेशी) ‘गुलामी से आजादी’ बताया। तालिबान का इस्तेमाल वह भारत में आतंकी गतिविधियां बढ़ाने में करेगा, यह तय है। ऐसे में भारत का तालिबान से सीधे कोई रिश्ता न रखना पाक के लिए सोने में सुहागा ही होगा। आश्चर्य नहीं कि वो कंधार जैसी घटनाओं को फिर हवा दे। तब भारत क्या करेगा?‍ किस-किस से लड़ेगा?

हो सकता है कि अमेरिका और उसके समर्थक साठ से अधिक देश अफगानिस्तान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दें। लेकिन तालिबान को चीन, रूस और कुछ मुस्लिम राष्ट्रों से मदद मिलती रहेगी। तालिबान का लक्ष्य अफगानिस्तान को विकसित देश बनाने का है भी नहीं। और जब अमेरिका अपनी बात से फिर सकता है तो ये तो तालिबान हैं, जिनका मुख्य लक्ष्य ही शरीया कानून लागू करना है। (मध्‍यमत)
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