राकेश अचल 

दिल्ली की दहलीज पर बीते 22 रोज से धरना देकर बैठे किसानों से बातचीत का सिलसिला बंद कर चुकी सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले ज्यादा उदार मानता हूँ। तोमर साहब हमारे ग्वालियर अंचल की शान हैं, हम सब उन्हें प्रेम से मुन्ना कहते हैं,  कल उन्होंने किसानों के नाम आठ पेज की चिठ्ठी लिख कर ये साबित भी कर दिया कि उनका मन आज भी पहले की तरह सुकोमल है,  लेकिन सवाल ये है कि अब किसानों को चिठ्ठी लिखने का अर्थ क्या है?

देश का आंदोलनरत किसान जब सरकार से छह दौर की बातचीत से संतुष्ट नहीं हुआ तो क्या उसे आठ पेज की चिठ्ठी लिख कर संतुष्ट किया जा सकता है,  समझाया जा सकता है? शायद नहीं। मुन्ना की किसानों की चिठ्ठी बीते रोज हम खबरनबीसों के वाट्सअप पर भी डाली गयी। हमने भी ये चिठ्ठी पढ़ी। हमारी समझ में भी नहीं आया कि मुन्ना यानि उनकी सरकार कहना क्या चाहती है।

मुन्ना 1962 के नेताओं की भूमिका पर उंगली उठाकर वो ही गलती कर रहे हैं जो उनके नेता करते आ रहे हैं। 1962 में मुन्ना खुद पांच साल के रहे होंगे, तब वे तत्कालीन नेताओं की भूमिका का कितना आकलन कर सकते होंगे,  ये भगवान ही जाने। मुन्ना को अपने खत में क्या लिखना चाहिए या नहीं ये तो वे ही जानें लेकिन हमारी समझ में तो सिर्फ इतना आया कि कृषि मंत्री की हैसियत से उनका ये प्रयास निरर्थक है।

जिस देश में किसानों को अपने प्रधानमंत्री पर यकीन नहीं है उस देश के किसान एक कृषि मंत्री की बात पर भरोसा कैसे करेंगे? और क्यों करेंगे?  सरकार का पिछला इतिहास बताता है कि वो जो कहती है सो करती नहीं है और जो करती है सो कहती नहीं है। अर्थात सरकार की करनी और कथनी में भेद है। और ये भेद हर सरकार की कथनी और करनी में होता है। ये भेद सत्ता की अपनी बीमारी है। इस पर अलग से लिखा-पढ़ा जा सकता है।

अभी तो सवाल ये है कि सरकार निरर्थक खतो-किताबत के बजाय सीधे फैसले पर क्यों नहीं आ रही? क्यों किसानों को खून जमा देने वाली सर्दी में मरने के लिए विवश कर रही है? देश की मजबूत और राष्‍ट्रवादी सरकार आखिर हठधर्मी पर आमादा क्यों है? कृषि कानूनों को सरकार ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न क्यों बना लिया है? सरकार के पास न किसानों के सवालों के उत्तर हैं और न आम आदमी के सवालों के।

सरकार पहले बातचीत की टेबिल पर बैठती है फिर मामले को अपने शुभचिंतकों के जरिये अदालत में घसीटती है और फिर खत लिखने का अभिनय करती है,  आखिर इस सबकी क्या जरूरत है? किसानों का आंदोलन किसी अदालत के कहने से हल नहीं होगा, ये सरकार का कार्यक्षेत्र है, सरकार को ही किसानों की समस्या का समाधान करना होगा। आखिर कब तक सरकार शतुरमुर्ग की मुद्रा अख्तियार करे रहेगी?

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की किसानों के नाम लिखी चिठ्ठी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुश हैं,  उन्होंने इसे लेकर ट्वीट भी किया है,  लेकिन आगे बढ़कर किसानों से बात करने के लिए वे भी राजी नहीं हैं। प्रधानमंत्री जी ने अभी तक किसानों के नाम कोई चिठ्ठी नहीं लिखी लेकिन वे अपने मन की बात काशी और कच्छ जाकर कर चुके हैं। उनके संदेशों से जाहिर है कि सरकार किसी भी सूरत में किसानों की मांगे मानने के लिए राजी नहीं है।

जब सरकार का स्पष्ट रुख है तो फिर कृषि मंत्री खूब चिठ्ठी लिखते रहें कुछ होने वाला नहीं है। वैसे भी कृषि मंत्री की चिठ्ठी में नया कुछ भी नहीं ही। वे नया लिखते भी क्या? किसानों के मौजूदा आंदोलन में कृषि मंत्री नहीं केंद्र की सरकार उलझी है। किसानों का आंदोलन कृषि मंत्री की वजह से नहीं केंद्र सरकार की नीतियों की वजह से जन्मा है सो केंद्र सरकार ही इसका समापन करा सकती है।

बातचीत नाकाम हो चुकी है,  चिठ्ठी का कोई असर हो नहीं रहा है। अब एक ही सूरत बची है कि सरकार किसानों को या तो ताकत के बल पर खदेड़ दे या फिर उन्हें सर्दी में बेमौत मरने के लिए छोड़ दे। अब रास्ता किसानों को नहीं सरकार को चुनना है। किसान तो आंदोलन के रास्ते पर पहले से हैं ही। ये बात अलग है कि सरकार की हठधर्मी से आंदोलनरत किसानों में अवसाद घर कर रहा है और वे आत्मोत्सर्ग तक करने लगे हैं।

मुझे सरकार का ये आरोप जंचता है कि देश के विपक्षी दल किसानों के कन्धों पर रखकर अपनी बन्दूक चला रहे हैं, लेकिन मुझे अब ये भी साफ़ दिखाई दे रहा है कि प्रधानमंत्री जी भी अब कृषि मंत्री के कंधे पर रखकर अपनी बन्दूक चलाये जा रहे हैं। कायदे से तो सरकार को किसान आंदोलन को इतना लंबा खिंचने देने के बजाय संसद का विशेष अधिवेशन बुलाकर दूध का दूध और पानी का पानी कर देना चाहिए था किन्तु सरकार की शायद ऐसी कोई मंशा नहीं है।

सरकार किसान आंदोलन के जवाब में देशभर में 700 सभाएं करा सकती है लेकिन संसद का एक विशेष सत्र नहीं बुला सकती, क्योंकि इससे कोरोना फ़ैल जाएगा। सरकार के तर्कों पर कभी कभी हंसी आती है तो कभी-कभी अपना सिर धुनने का मन करता है। आश्रम प्रतिष्ठान से जुड़े होने के कारण हम सत्ता प्रतिष्‍ठान के खिलाफ नहीं हैं,  किन्तु हकीकत ये है कि देश की सत्ता इस समय मदांध दिखाई दे रही है। उसने विपक्ष को नकार दिया है और अब जनता को भी नकार रही है। ये अलोकतांत्रिक कृत्य है।

लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है और आगे भी रहेगी। जनादेश का अर्थ आप अपने मन से नहीं निकाल सकते। जो जनता को पसंद नहीं है उसे आप जनता पर थोप नहीं सकते। और अगर ऐसा करते हैं तो ये अपराध है और इससे देश में अराजकता जन्म लेती है। पिछले 22 दिनों में सरकार ने किसान आंदोलन को बदनाम करने, विखंडित करने और हतोत्साहित करने के सारे हथकंडे इस्तेमाल कर लिए हैं लेकिन किसान अपने स्थान से रत्ती भर भी डिगे नहीं हैं आप चाहें तो इसे किसानों की हठधर्मिता कह लें लेकिन मैं इसे किसानों की एकजुटता कहता हूँ।

आने वाले दिनों में किसान आंदोलन का स्वरूप कैसा होगा कहना कठिन है,  लेकिन ये आंदोलन लोकतंत्र के सभी स्तम्भों की कलई खोलने का काम अवश्य कर रह है। न्यायपालिका को छोड़ सभी पहले से इस आंदोलन को तोड़ने के पाप में भागीदार हैं और अब कोशिश की जा रही है कि येनकेन किसी तरह न्यायपालिका को भी इसमें घसीट लिया जाये। न्यायपालिका के पास तीसरी आँख होती है इसलिए उम्मीद है कि वो किसान आंदोलन से अलग ही रहेगी। बाकी रब दी मर्जी है साब!