जयंती विशेष 

गिरीश उपाध्याय

12 जनवरी दिन स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस के साथ ही राष्‍ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। चूंकि स्वामी विवेकानंद का युवाओं से एक विशेष रिश्ता था और वे स्वयं भी सिर्फ 39 वर्ष की अल्पायु यानी लगभग युवावस्था में ही परमगति को प्राप्त हो गए थे इसलिए भी उनके और युवाओं के बीच के रिश्तों को गहराई से जानने की जरूरत है। एक संचारक के नाते स्वामी विवेकानंद का योगदान भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अद्वितीय है। पर स्वामीजी ने जिसे सबसे अधिक प्रभावित किया और प्रेरणा दी वह युवा पीढ़ी ही थी। वे चाहे भारत में रहे हों या दुनिया के भ्रमण पर, उन्होंने युवाओं से संवाद का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं दिया।

यह पूछा जा सकता है कि आखिर स्वामीजी ने युवाओं के लिए क्या संदेश दिया, वे युवाओं से क्या चाहते थे या कि आज के युवा स्वामी विवेकानंद से क्या प्रेरणा ग्रहण करें? इसका उत्तर दो शब्दों में खोजा जा सकता है पहला शब्द है ‘जागो’ और दूसरा है ‘जानो’। पश्चिमी देशों के दौरे के बाद भारत आगमन पर स्वामीजी ने मद्रास (वर्तमान चैन्नई) में युवाओं को संबोधित करते हुए कठोपनिषद से एक सूत्र युवाओं को दिया था- ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।’ यानी उठो जागो और अभीष्ट को प्राप्त करो। और उनका दूसरा मंत्र था अपने राष्ट्र को, इसकी महान संस्कृति को, इसकी सभ्यता और यहां के धर्म को जानो, जो मानव मात्र की सेवा की बात करता है।

स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी समाज व राष्ट्र की मूलभूत चेतना उसकी युवा शक्ति में ही निवास करती है। इसीलिए उन्होंने युवा शक्ति को भविष्य निर्माता के रूप में देखा और उससे संवाद कायम किए। युवाओं को भारत की उत्कृष्ट, उदात्त और महिमावान संस्कृति का बोध कराते हुए उन्होंने कहा- ‘‘अपने महिमावान अतीत को मत भूलो। स्मरण करो.. हम कौन है? किन महान पूर्वजों का रक्त हमारी नसों में प्रवाहित हो रहा है? एक ऐसे महान भारत की नींव रखो जो विश्व का पथप्रदर्शन कर सके।‘‘

स्वामी विवेकानंद भारत के उन महापुरुषों में अग्रणी हैं जो युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। वे भारतीय युवा प्रेरणा के प्रतीक पुरुष या यूथ आइकन हैं। उनका तेजस्वी शरीर और संपूर्ण व्यक्तित्व इतना आकर्षक, प्रभावी, भव्य और उदात्त है कि बरबस ही वह युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। स्वामीजी ने न सिर्फ अपने समय में युवाओं को जाग्रत किया, बल्कि आज भी उनके विचार युवाओं को चुंबक की तरह अपनी ओर खींचने की क्षमता रखते हैं। एक युवा में कितनी ऊर्जा और तेज होता है और वह इस ऊर्जा का समाज के लिए किस तरह उपयोग कर सकता है, स्वामी विवेकानंद का स्वयं का जीवन इसका श्रेष्ठतम उदाहरण है। मात्र 39 वर्ष की आयु में ही देह त्याग देने वाले इस महापुरुष में हम वो सारे गुण देख सकते हैं जिनकी एक युवा में जरूरत होती है या एक युवा से जिन गुणों की अपेक्षा की जाती है। स्वामीजी स्वयं अपने जीवन और कर्म से युवाओं के सामने आदर्श उपस्थित करते हैं।

संचार करने और किसी भी संचार को ग्रहण करने की सबसे उपयुक्त आयु युवावस्था ही होती है। स्वामीजी स्वयं युवा थे और एक युवा क्या सोच सकता है, क्या कर सकता है, उसकी सामर्थ्य और उसकी कमजोरियाँ क्या हैं, वे अच्छी तरह जानते थे। इसलिए उन्होंने सर्वाधिक संचार या संवाद युवाओं के साथ ही किया है। युवाओं से बातचीत करते समय उनकी भाषा और शैली अलग ही नजर आती है। वे युवाओं से किसी हमउम्र दोस्त की तरह ही बात करते हैं। उन्हें पूरे अधिकार से समझाते भी हैं, झिड़कते या फटकारते भी हैं और प्यार भी करते हैं। वे युवाओं की कमियों और कमजोरियों को बताते जरूर हैं लेकिन उनकी क्षमता पर अविश्वास नहीं करते। वे मानते हैं कि युवा अपार ऊर्जा का स्रोत हैं, उन्हीं में देश को बदलने की क्षमता है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि एक बार यदि भारत का युवा पूरे संकल्प के साथ उठ खड़ा हुआ तो दुनिया की कोई ताकत उसे नहीं रोक सकती। आज हम देखते हैं कि स्वामी विवेकानंद की यह भविष्यवाणी कई मायनों में सच हो रही है। भारत के कई युवा दुनिया भर में बड़े बड़े संस्थानों का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके ज्ञान, प्रतिभा और उनकी ऊर्जा ने पूरे विश्व को चमत्कृत कर दिया है। अमेरिका हो या इंग्लैंड या जर्मनी, कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष तक सार्वजनिक रूप से भारतीय युवाशक्ति का लोहा मान चुके हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो कई बार अमेरिकी युवाओं से कहा था- सँभलो वरना भारत का युवा आकर तुम्हें पीछे धकेल देगा।

स्वामी विवेकानंद का दृढ़ विश्वास था कि नए भारत का निर्माण युवा पीढ़ी ही करेगी, वे कहते हैं- ‘’नवयुवको, तुम्हारे ऊपर ही मेरी आशा है। क्या तुम अपनी जाति और राष्ट्र की पुकार सुनोगे? यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो मैं कहूँगा कि तुममें से प्रत्येक का भविष्य उज्ज्वल है। अपने आप पर अगाध, अटूट विश्वास रखो।… तुम सारे भारतवर्ष को पुनर्जीवित कर सकोगे।‘’

वे मानते थे कि असीमित ऊर्जा और बल से भरी युवा पीढ़ी ही सारी समस्याओं का हल निकालेगी- ‘’मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में है, नई पीढ़ी में है, मेरे कार्यकर्ता उसमें से आएँगे। सिंहों की भाँति वे समस्त समस्याओं का हल निकालेंगे।‘’

स्वामीजी युवकों से सीधा संवाद करते हुए उन्हें देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को प्रेरित करते हैं-‘’बलशाली, स्वस्थ, तीव्र मेधा वाले और उत्साहयुक्त युवक ही ईश्वर के पास पहुँच सकते हैं। तुम्हारा भविष्य निश्चित करने का यही समय है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि अभी इस भरी जवानी में, इस नए जोश के जमाने में ही काम करो, जीर्ण शीर्ण हो जाने पर काम नहीं होगा। काम करो, क्योंकि काम करने का यही समय है।… अपनी जाति, देश, राष्ट्र और समग्र मानव समाज के कल्याण के लिए आत्मोत्सर्ग करना सीखो। जीवन में क्या है? … अपने आगे एक महान आदर्श खड़ा करें और उसके लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दें, यही हमारा निश्चय हो।‘’

एक बार कोई नवयुवक स्वामीजी के पास गया और उनसे बोला, ‘स्वामीजी! मुझे गीता समझा दीजिए। स्वामीजी ने उससे कहा ‘गीता समझने का वास्तविक स्थान फुटबाल का मैदान है। जाओ, घंटे भर खेल-कूद लो। गीता तुम स्वयं समझ जाओगे।‘ वे युवाओं को बलवान और निडर बनने का संदेश देते हुए कहते हैं कि दुर्बल के लिए दुनिया में कोई जगह नहीं है। दुर्बलता चाहे तन की हो या मन की, वह मनुष्य जाति के सर्वनाश का कारण बनती है। उन्‍होंने कहा था-‘’मेरे नौजवान दोस्तो! बलवान बनो। तुम्हारे लिए मेरी यही सलाह है। गीता का उपदेश कायरों को नहीं दिया गया था, किंतु अर्जुन को दिया गया था, जो बड़ा शूरवीर, पराक्रमी और क्षत्रिय शिरोमणि था। भगवान कृष्ण के उपदेश और अलौकिक शक्ति को तुम तभी समझ सकोगे, जब तुम्हारी रगों में खून कुछ और तेजी से दौड़ेगा।‘’

विवेकानंद युवकों को अपने जीवन का उद्देश्य तय करने के लिए प्रेरित करते हुए कहते हैं कि न तो कीड़े मकोड़ों की तरह जिएँ और न उनकी तरह मरें- ‘’तेरे मेरे जैसे न जाने कितने कीड़े पैदा होते रहते हैं और मरते रहते हैं। इससे दुनिया को क्या हानि लाभ? एक महान उद्देश्य लेकर मर जा। मरना तो है ही, पर अच्छा उद्देश्य लेकर मरना ठीक है। तुम्हीं लोग देश की आशा हो, तुम्हें कर्मविहीन देखकर मुझे बड़ा कष्ट होता है। लग जा, काम में लग जा। विलंब न कर, मृत्यु तो दिनोंदिन निकट आ रही है। ‘बाद में करूँगा‘ कहकर अधिक बैठा न रह- यदि बैठा रहेगा तो फिर तुझसे कुछ भी न हो सकेगा।‘’

युवाओं को शक्तिशाली और ऊर्जावान बनाने पर उनका सर्वाधिक जोर था- ‘’आज हमें जिसकी आवश्यकता है, वह है लोहे के पुट्ठे और फौलाद के स्नायु। हम लोग बहुत दिन रो चुके। अब और रोने की आवश्यकता नहीं। अब अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और ‘मर्द’ बनो। हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है जिससे हम मनुष्य बन सकें। हमें ऐसे सिद्धांतों की जरूरत है जिससे हम मनुष्य हो सकें। हमें ऐसी सर्वांगसंपन्न शिक्षा चाहिए, जो हमें मनुष्य बना सके।‘’

स्वामीजी युवकों में अभय जगाना चाहते थे। ऐसी पीढ़ी जिसमें डर नाम की चीज न हो। वो उठे तो सारा संसार उठ खड़ा हो वो चले तो सारा संसार चलने लगे- ‘’उठो जागो, शुभ मुहूर्त आ गया है। सब चीजें अपने आप तुम्हारे सामने खुलती जा रही हैं। हिम्मत करो और डरो मत।‘’ स्वामीजी का स्वयं का जीवन इस कथन का जीता जागता उदाहरण है। वे जीवन में किसी से नहीं डरे। न किसी मनुष्य से और न किसी परिस्थिति से। चाहे जैसी भी स्थिति हो उन्होंने पूरी ताकत और जीवट से उसका मुकाबला किया। स्वामीजी यही अभय भाव प्रत्येक युवा में चाहते थे।

स्वामी जी युवाओं को चरित्र और आचरण की शुद्धता बनाए रखने का भी संदेश देते हैं। वे कहते हैं- ‘’निस्वार्थ बनो और कभी एक मित्र को पीठ पीछे दूसरे की निंदा करते मत सुनो। मैं चाहता हूँ कि हममें किसी प्रकार की कपटता, मक्कारी, कोई दुष्टता न रहे। मेरे साहसी बच्चो, आगे बढ़ो, चाहे धन आए या न आए, आदमी मिलें या न मिलें। बस, आगे बढ़ो, तुम्हें कोई न रोक सकेगा। असत्य को पास न फटकने दो। सत्य पर डटे रहो, बस तभी हम सफल होंगे- शायद थोड़ा अधिक समय लगे, पर सफल हम अवश्य होंगे। भविष्य की पचास सदियाँ तुम्हारी ओर ताक रही हैं, भारत का भविष्य तुम पर ही निर्भर है। काम करते जाओ।‘’

स्वामी विवेकानंद ने पराधीन भारत में विघटित होते जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए युवा पीढ़ी पर ही सबसे अधिक भरोसा किया था। महिमामंडित भारत भूमि के आध्यात्मिक वैभव के क्षरण और निष्क्रिय होती युवा चेतना की सुषुप्ति को देख, जैसे उनकी आत्मा हाहाकार कर उठी। उन्होंने सिंहगर्जना करते हुए राष्ट्र की सुषुप्त युवा चेतना को झकझोर कर जगाते हुए कहा- उठो! जागो, आलस्य, दुर्बलता और व्यामोह को त्यागो और तब तक चैन न लो जब तक अभीप्सित लक्ष्य को प्राप्त न कर लो…।

स्वामीजी युवाओं में उत्कृष्ट संस्कारों का जागरण चाहते थे। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि संस्कार समाज की शिराओं में बहने वाले रक्त की भाँति होते हैं। उनकी उत्कृष्टता से समाज का उन्नयन होता है और उनकी निकृष्टता से समाज का पतन। युवा पीढ़ी के विकृत संस्कारों को वे समाज के पतन का कारण मानते थे। उन्होंने एक व्याख्यान में कहा था- ‘‘युवा चेतना यदि घोर नास्तिक हो जाए तब भी उतनी खतरनाक नहीं होती जितनी वह कुसंस्कारी होने पर होती है। क्योंकि नास्तिक को तो राह पर लाया जा सकता है किंतु कुसंस्कारी को विनाश के गर्त में समाने से बचाना असंभव है।‘‘ कदाचित स्वामीजी की दृष्टि ने आज के संस्कारहीन समय के परिदृश्यच को बहुत पहले ही पढ़ लिया था।

स्वामी विवेकानंद ने भारत के कई महापुरुषों को प्रेरणा दी। देश में युवाओं के एक और प्रेरणा स्रोत एवं महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाषचंद्र बोस स्वयं विवेकानंद के विचारों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने एक बार लिखा-‘’ वे (स्वामी विवेकानंद) इतने महान, गहन और बहुमुखी थे कि मैं घंटों लिखकर भी इन महापुरुष की महिमा के प्रति तनिक भी न्याय नहीं कर सकूँगा। वे विश्व के प्रथम ऐसे सर्वोच्च स्तर के योगी थे, जिन्होंने ब्रह्म साक्षात्कार करने के बाद भी स्वदेश एवं मानवता के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए अपना संपूर्ण जीवन अर्पित कर दिया था। आज यदि वे जीवित होते, तो मैं उनके चरणों में होता। जहाँ तक मेरा खयाल है, वर्तमान भारत उन्हीं की कृति है।‘’