गिरीश उपाध्‍याय

देश इस बार आजादी के ‘अमृत महोत्सव’ वर्ष के दौरान गणतंत्र दिवस मना रहा है। हमारे संविधान का ‘अमृत महोत्सव’ वैसे तो दो साल बाद शुरू होगा, लेकिन आजादी के अमृत महोत्‍सव के दौरान आए इस गणतंत्र दिवस पर भारत के संविधान को लेकर अतीत के कुछ पन्ने जरूर पलटे जा सकते हैं। ये वो पन्ने हैं जो बताते हैं कि आजादी मिलने से काफी पहले ही भारत के लोगों ने आजाद भारत के संविधान के बारे में न सिर्फ सोचना शुरू कर दिया था बल्कि कई लोगों ने अपने स्तर पर उसका मसौदा भी तैयार किया था।

बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की अगुवाई वाली संविधान सभा की ड्राफ्ट कमेटी द्वारा तैयार संविधान तो 26 नवंबर 1949 को स्‍वीकार किया गया था लेकिन उससे तीन साल पहले गांधीवादी अर्थशास्त्री और विचारक श्रीमन्ना‍रायण अग्रवाल ने 1946 में एक ‘गांधीवादी संविधान’ बनाकर खुद गांधीजी को प्रस्तुत किया था। अग्रवाल के इस संविधान की खासियत या महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि उसकी प्रस्तावना खुद गांधीजी ने लिखी थी और उसमें उन्होंने कहा था कि ‘यद्यपि इसे मेरे द्वारा लिखा हुआ संविधान न माना जाए, लेकिन अग्रवाल जी ने जो लिखा है वो मेरे विचारों के अनुरूप है।’

ऐसे में यह जानना दिलचस्प होगा कि आखिर ऐसा क्या था कि अग्रवाल के लिखे उस ‘गांधीवादी संविधान’ को गांधीजी ने भी परोक्ष रूप से मान्यता दी थी। और यह भी कि यदि संविधान निर्माण के काम में गांधीजी खुद जुटे होते तो उनके हिसाब से संविधान का स्वरूप क्या होता। हालांकि अग्रवाल के ‘गांधीवादी संविधान’ पर गांधीजी ने अपना संविधान होने की मुहर तो नहीं लगाई लेकिन उनका यह कहना ही बहुत सी बातों पर विचार की मांग करता है कि ‘अग्रवाल जी का यह काम मेरे विचारों से असंगत नहीं है।‘

वैसे तो इस गांधीवादी संविधान में अनेक मुद्दों और विषयों पर चर्चा की गई है लेकिन यदि इसे आज के संदर्भ में टटोलना हो तो इसमें बहुत कुछ बातें ऐसी हैं जो बताती हैं कि जिस पुरानी पीढ़ी को हम इन दिनों खारिज करने पर तुले हैं वह पीढ़ी कितनी दूरदर्शी या भविष्यदृष्टा थी और भारत व भारत के समाज की तासीर को वह कितनी गहराई से जानती थी।

अगर हम आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में होने जा रहे पांच राज्यों  के विधानसभा चुनाव को लेकर हो रही राजनीतिक घटनाओं को ही ले लें तो पाएंगे कि लोकतंत्र और हमारी चुनाव प्रणाली की आज जो दुर्दशा हो रही है उसे हमारी पुरानी पीढ़ी ने करीब 75 साल पहले ही किस तरह पढ़ लिया था और उसके कारण पैदा होने वाले खतरों की तरफ किस तरह आगाह कर दिया था।

कहने को हम भारत को लोकतंत्र कहते हैं लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इस लोकतंत्र में धनतंत्र का प्रभाव और विस्‍तार किस तरह बढ़ता जा रहा है। स्वतंत्र भारत का ‘गांधीवादी संविधान’ ऐसे लोकतंत्र के बारे में कहता है कि- पूंजीवादी ‘लोकतंत्र’ में, पूंजीवाद को किसी भी गंभीर खतरे का सामना नहीं करना पड़ता, इसलिए वह तुलनात्मक रूप से शांत और सहिष्णु बने रहने का जोखिम उठा सकता है। लेकिन हम समाज को ‘अमीरों के शहर’ और ‘गरीबों के शहर’ में बांट कर सच्‍चा लोकतंत्र स्थापित नहीं कर सकते। ऐसी स्थिति में ‘राज्य’  हमेशा उस वर्ग का सेवक होता है, जो वर्ग संसाधनों और उत्पादन का या तो मालिक होता है या उस पर हावी होता है। धनवान वर्ग, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, विधायिकाओं, प्रेस और प्रकाशन गृहों, शैक्षणिक संस्थानों और प्रचार के अन्य साधनों को नियंत्रित करता है। वह लोकतंत्र का अपने स्वार्थ के लिए शोषण करता है और अंतत: उसे धनतंत्र तक सीमित कर देता है।

इसी तरह चुनाव और चुनाव प्रक्रिया के बारे में भी इस ‘गांधीवादी संविधान’ में बहुत ही खरी खरी बात कही गई है। यह कहता है कि आधुनिक लोकतंत्रों में धन की अस्वास्थ्यकर शक्ति के अलावा, चुनावी प्रणाली बहुत दोषपूर्ण और अवांछनीय है। बड़े निर्वाचन क्षेत्रों का अस्तित्व मतदाताओं और उम्मीदवारों के बीच प्रत्यक्ष और अंतरंग संपर्क को लगभग असंभव बना देता है। और जब प्रत्यक्ष संपर्क नहीं हो पाता तो उसका विकल्प ‘चुनावी अभियान’ होता है जिसकी कमियां अथवा बुराइयां सर्वज्ञात हैं।

अग्रवाल इस मामले में बर्नार्ड शॉ को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि शॉ ने अपनी अनूठी शैली में इस तरह की चुनावी सभाओं को ऐसा ‘निंदनीय और घृणित प्रदर्शन’ बताया था, जिसमें कोई व्यक्ति तब तक चिल्लाता है जब तक सामने वाला यह विश्वास नहीं कर लेता कि निश्चित ही वह किसी पागलखाने से आया है। ऐसे चुनाव सही प्रतिनिधियों का चयन सुनिश्चित नहीं करते। और गांधीजी के अनुसार ऐसे में हम लोकतंत्र के स्थान पर, ‘भीड़तंत्र’ को देखते हैं।

‘’शायद यही कारण है कि सभ्य, सक्षम और शांत लोग चुनावों के ऐसे शोर और गंदगी से दूर ही रहते हैं। और इन परिस्थितियों में बेईमान और ‘मोटी चमड़ी’ वाले ऐसे उम्मीदवार अवसर का लाभ उठा लेते हैं जो रिश्वत और भ्रष्टाचार जैसे हथियारों से लैस होते हैं। चुनावों में किया गया यह गलत खर्च स्वाभाविक रूप से लोकतंत्र को पूंजीपतियों की बाहों में ले जाता है और इस तरह अंततः वे ही शासन करते हैं।‘’

‘गांधीवादी संविधान’ परोक्ष रूप से छोटे निर्वाचन क्षेत्रों की वकालत करते हुए कहता है कि विशाल निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव की वर्तमान प्रणाली बहुत अधिक मशीनी होने के कारण लोगों के मन में उदासीनता पैदा करती है। मतदाताओं को उन उम्मीदवारों के बारे में कोई वास्तविक जानकारी नहीं मिल पाती जो कठोर पार्टी संगठनों या ‘कॉकस’ द्वारा खड़े किए जाते हैं। कोई भी चुनाव मतदाताओं को किसी तरह बूथ तक घसीट लाने का उपक्रम ही होता है। ऐसी व्यवस्था में जहां केवल ‘हाथ’ गिने जाते हैं ‘सिर’ नहीं, जहां वोट केवल गिने जाते हैं, तौले नहीं जाते, वहां समाज के बुद्धिजीवी वर्ग से उसमें उत्साह से शामिल होने की अपेक्षा भी कैसे की जा सकती है।

गांधीवादी संविधान लोकतंत्र के स्वरूप और चुनाव प्रक्रिया के दुर्गुणों का जिक्र करने के बाद खुद ही सवाल उठाता है कि- तो फिर हमारे लोकतंत्र को किस दिशा में जाना चाहिए। और जवाब देता है कि, यह दिशा है गांधीवादी रास्ता, जिसके दो ही बुनियादी सिद्धांत हैं- अहिंसा और विकेंद्रीकरण।

गांधी मानते हैं कि विकेंद्रीकरण ही अहिंसक लोकतंत्र का उपाय है। हिंसा तार्किक रूप से केंद्रीकरण की ओर ले जाती है; जबकि अहिंसा का सार विकेंद्रीकरण है। गांधीजी हमेशा, आत्मनिर्भर और स्वशासी ग्राम समुदायों के रूप में आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के इस तरह के विकेंद्रीकरण की वकालत करते रहे हैं। वह ऐसे समुदायों को अहिंसक संगठन का मॉडल मानते हैं। हालांकि, गांधीजी का यह मतलब भी नहीं है कि प्राचीन भारतीय ग्राम गणराज्यों को पुराने रूप में ही पुनर्जीवित कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि यह न तो संभव है और न ही वांछनीय। उनके अनुसार आधुनिक बदली हुई परिस्थितियों और जरूरतों को देखते हुए हमें उस प्रणाली में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। और गांधी का यह रास्‍ता बताते हुए ‘गांधीवादी संविधान’ पंचायत और ग्राम आधारित/केंद्रित राज व्यवस्था और लोकतंत्र की स्थापना पर जोर देता है।

हालांकि आज के समय में लगभग 75 साल पुरानी बातों में से कई बातों को बेकार और बेमानी बताया जा सकता है, कहा जा सकता है कि देश आजादी के बाद बने आधिकारिक संविधान के अनुरूप चलते हुए बहुत आगे बढ़ गया है, लेकिन फिर भी यह तो हमें सोचना ही होगा कि गांधीवादी विचारों के अनुरूप जिस संविधान को 1946 में तैयार किया गया था, उसमें उठाई गई बातें क्या सचमुच विचार के योग्य नहीं हैं। क्या सचमुच हम वर्तमान संविधान पर चलते हुए वह वांछित और दुर्गुणरहित चुनाव प्रक्रिया पा सके हैं जो हमें एक स्वस्थ एवं आदर्श लोकतंत्र के रूप में स्थापित करती हो।(मध्यमत)
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