अजय बोकिल

मध्यप्रदेश अपनी स्थापना के 66 वर्षों में प्रगति के किस मुकाम तक पहुंचा है, जहां तक पहुंचना था, वहां तक पहुंचा है या नहीं, इन बातों पर लंबी बहस हो सकती है। लेकिन इन सात दशकों में मप्र की सूरत और तासीर अगर बदली है तो इसके पैमाने और आकांक्षाओं का क्षितिज क्या है? सिर्फ जुमलों का कालांतरण या सपनों का हकीकत में रूपांतरण? ये सवाल इसलिए मौजूं हो गए हैं क्योंकि प्रदेश में शिवराज सरकार ने अब नए ‘आत्म‍निर्भर मध्यप्रदेश’ का रोड मैप पेश किया है। सरकार के मुताबिक यह रोडमैप इस साल 1 सितंबर से जमीन पर उतारना ‍शुरू हो जाएगा।

इसकी प्लानिंग के लिए कोरोना काल में बाकायदा एक वेबिनार हुआ। साथ ही लोगों से प्रदेश की अधोसंरचना, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सुशासन के संदर्भ में सुझाव मांगे गए। इस सुझावों पर आधारित अंतिम ड्राफ्ट मंत्री समूह तैयार करेगा, जिसे 25 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट देनी है। इसी परिप्रेक्ष्य में याद आया कि शिवराज सरकार ने आज से दस साल पहले भी ऐसी ही लंबी कवायद कर ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ का मेगा प्लान बनाया था।

मई 2010 में बुलाए गए विधानसभा के विशेष सत्र में व्यापक चर्चा के बाद मप्र को स्वर्णिम बनाने 70 सूत्रीय संकल्प पत्र सर्वसम्मति से पारित किया गया। गहराई से देखें तो उन संकल्पों का लक्ष्य भी वही था, जो आत्मनिर्भर मप्र के प्रस्तावित ड्राफ्ट का है। बल्कि यूं कहे कि 70 सूत्री संकल्पों की बुनियाद पर ही ‘आत्मनिर्भर मप्र’ का मास्टर प्लान रचने की तैयारी है तो गलत नहीं होगा। ऐसे में यह जायजा लेना वाजिब और दिलचस्प है कि दस साल में (डेढ़ साल में कमलनाथ सरकार के छिंदवाड़ा विकास मॉडल को छोड़ दें) मप्र कितना स्वर्णिम बना? ‘स्वर्णिम’ और ‘आत्म निर्भर’ मध्यप्रदेश में गुणात्मक अंतर क्या है? विकास की पूर्णाहुति ‘स्वर्णिम’ होने में है या ‘आत्मनिर्भर’ होने में? यदि दोनों एक ही हैं तो इस नई कवायद का राजनीतिक संदेश क्या है?

इसमें शक नहीं‍ कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सपने देखने-दिखाने, नए प्लान सोचने, उन्हें क्रियान्वित की दिशा में अथक मेहनत करते हैं। सतत उद्यमशीलता उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है। अपने संकल्पों को राजनीतिक मुहावरों में परोसने की करने की कला भी उनके पास है। इसीलिए जब मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने अपनी चौथी पारी शुरू की तो जनमानस में यह स्वाभाविक जिज्ञासा थी कि इस बार उनकी झोली से क्या निकलने वाला है, क्योंकि मध्यप्रदेश सहित देश की जनता अमूमन नए सपनों, नए जुमलों और नवाचार देखने की आदी रही है।

‘आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश’ की संकल्पना भी उसी श्रृंखला की ताजा कड़ी लगती है, जिसमें कोरोना काल की चुनौतियों से जूझने और स्वर्णिम मध्यप्रदेश के छूटे सिरों को फिर से नए तरीके से पकड़ने का आग्रह ज्यादा है। इसकी पूर्वपीठिका के रूप में जो वेबिनार हुआ, उसमें यह गूंज साफ सुनाई दी कि मप्र अब बीमारू न होकर समृद्ध (इसे कांग्रेसी चश्मे न देखें) राज्य में तब्दील होता जा रहा है। फिर भी उसे विकास के पथ पर आगे बढ़ते रहने के लिए नए आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक बूस्टर की जरूरत है। हालांकि इस बूस्टर के मूल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘आत्मनिर्भर भारत’ का आइडिया ही है। मोटे तौर पर उनकी बात का अर्थ यही है कि देश हर मामले में आत्मनिर्भर हो और यह तभी संभव है जब देश के राज्य भी आत्मनिर्भर बनें। इस हिसाब से मप्र ने दौड़ शुरू होने के पहले ही अपनी पोजीशन ले ली है।

बहरहाल, ‘आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश’ का खास बिंदु है ‘आउट ऑफ बजट फंड’ निर्माण। यह इस बात की परोक्ष स्वीकृति भी है कि राज्य की माली हालत को किसी रामबाण काढ़े की जरूरत है। चौतरफा मंदी के माहौल में यह टास्क पूरा करना वाकई कठिन है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में अब देशी चिकित्सा पद्धति, आयुष, आदिवासी चिकित्सा पद्धति, योग आदि को बढ़ावा दिया जाएगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप राज्य में संस्कारी और रोजगारमूलक शिक्षा दी जाएगी। छठी कक्षा से ही व्यावसायिक शिक्षा लागू होगी। परंपरागत ज्ञान अभिलेखित होगा। प्रतिभा निखारने के लिए ‘प्रखर योजना’ चालू होगी।

कोरोना लॉक डाउन ने प्रदेश में फल रहे पर्यटन उद्योग की कमर तोड़ दी है। इसके लिए ‘बफर में सफर’ को बढ़ावा देने का संकल्प है। साथ ही प्रदेश में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ पर प्रभावी अमल होगा। यानी किसी भी स्टार्ट अप को 30 दिन में धंधा शुरू करने को कहा जाएगा। साथ ही मुख्यमंत्री दक्षता संवर्धन योजना पर भी कार्य किया जाएगा आदि। यानी वो तमाम बातें, जो अच्छे प्लानिंग की निशानी हैं।

अब जरा स्वर्णिम मध्यप्रदेश के उन संकल्पों पर नजर डालें, जो 8 साल तक शिवराज सरकार के दिशा-दर्शक रहे। प्रदेश के सर्वांगीण और समावेशी विकास पर केन्द्रित 70 सूत्रीय संकल्प प्रस्ताव विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ था। इसमें कहा गया था-

राज्य का ऐसा सर्वांगीण एवं समावेशी विकास हो, जिससे प्रदेशवासियों का जीवन उत्तरोत्तर समृद्ध एवं खुशहाल बने तथा उन्हें अपनी क्षमताओं के अनुरूप सर्वश्रेष्ठ कार्य करने और राष्ट्र के विकास में योगदान देने का अवसर प्राप्त हो। यह सदन संकल्प करता है कि हम प्रदेश में खेती को लाभ का धंधा बनाएंगे। मूलभूत सेवाओं के विस्तार के साथ अधोसंरचना का निरंतर सुदृढ़ीकरण करेंगे। निवेश का अनुकूल वातावरण निर्मित करेंगे। सबको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था उपलब्ध कराएंगे।

महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति,पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक एवं सामान्य निर्धन वर्ग को सशक्त कर उनकी विकास में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करेंगे। सुदृढ़ सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था बनाए रखेंगे तथा तथा राज्य व्यवस्था का संचालन सुशासन के स्थापित सिद्धांतों पर करेंगे। इनके अलावा प्रदेश की विकास दर 9 से 10 प्रतिशत तक रखने (2028-19 में यह 7 फीसदी थी) अपरम्परागत ऊर्जा के उत्पादन, उपकरणों एवं ऊर्जा संरक्षण उपायों को अनुदान, संभागीय मुख्यालयों को 4 लेन एवं जिला मुख्यालयों को 2 लेन सड़कों से तथा सभी गांवों को बारहमासी संपर्क सड़कों से जोड़ना,  सुनियोजित विकास के लिए सभी शहरों के सिटी डेवलपमेंट प्लान बनाना तथा नगरीय क्षेत्रों के विकास के लिए अधोसंरचना बोर्ड गठित करना।

ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्यमंत्री पेयजल योजना की शुरुआत एवं हर गांव का मास्टर प्लान तैयार करना। भण्डारगृह क्षमता वृद्धि, सुदृढ़ विपणन व्यवस्था के साथ प्रदेश को लॉजिस्टिक हब बनाना। सभी पात्र किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड व ‍ परियोजनाओं में किसान की भूमि 5 लाख रुपये प्रति एकड़ से नीचे क्रय न करना, खनिजों का मूल्य संवर्धन प्रदेश में ही करना, चार बड़े औद्योगिक कॉरीडोर का विकास, प्रदेश के उद्योगों में 50 फीसदी रोजगार मप्र वासियों को देना। खेल सुविधाएं पंचायतों तक पहुंचाने, मप्र खेल प्राधिकरण गठित करने। प्रशासनिक अमले को पुरस्कृत एवं दण्डित करने की प्रक्रिया प्रभावी बनाने तथा सिटीजन चार्टर सेवा का विस्तार करना आदि।

तब सदन में सीएम शिवराज ने कहा था ‍कि स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने के लिए सुशासन पहली शर्त है। अब सवाल यह कि ‘स्वर्णिम मध्यप्रदेश’ और ‘आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश’ की संकल्पना में फर्क क्या है? सरसरी तौर पर जो अंतर दिखता है, वो यह कि उस वक्त मुख्यमंत्री ने कहा था कि स्वर्णिम मध्यप्रदेश कृषि आधारित होगा और कृषि व्यवस्था गौ आधारित होगी। दूसरे, स्वर्णिम मध्यप्रदेश में हर क्षेत्र में विकास पर जोर था, लेकिन व्यवस्थाओं के केन्द्रीकरण का आग्रह नहीं था। बल्कि वह विकेन्द्रित और निचले स्तर तक पहुंचने वाली व्यवस्थाओं में ही विकास की सुनहरी किरणों को बूझ रही थी।

लेकिन ‘आत्मनिर्भर भारत’ के नवाचार का मूल तत्व व्यवस्थाओं का एकीकरण अथवा केन्द्रीकरण ज्यादा लगता है। आत्मनिर्भर मप्र के पांच मूल मंत्र बताए जा रहे हैं, जिनमें ‘एक जिला-एक पहचान’, ‘वन नेशन, वन मार्केट’ जैसे मंत्र भी शामिल हैं। स्वर्णिम मध्यप्रदेश में किसानी को लाभ का धंधा बनाने के साथ-साथ रोजगार निर्माण पर जोर था, आत्मनिर्भर भारत में भी वही है। फर्क यह है कि अब कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ उसके लिए मार्केट उपलब्ध कराने पर भी जोर है, जो आज की पहली जरूरत है। ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के तहत ‘स्टार्ट योर बिजनेस इन थर्टी डेज’ हकीकत कम, जुमला ज्यादा लगता है क्योंकि मप्र में समय पर उद्योग लगाना और लगाकर सुकून के साथ चलाना अभी भी कोरोना वैक्सीन तैयार करने जैसा ही कठिन है।

एमएसएमई के लिए ग्लोबल पार्क की बात कही गई है, लेकिन पुराने आईटी पार्कों का क्या हुआ,  उस पर निगाह डाल लेना भी ठीक होगा। जिस स्वर्णिम मप्र की अवधारणा ने मप्र को लगातार कृषि कर्मण पुरस्कार दिलवाए, उसी मप्र के किसानों को अपनी उपज के लिए समुचित बाजार और खाद्य प्रसंस्करण की गरज लंबे समय से है।

वेबिनार में एक प्रशस्ति यह मिली कि मप्र अब समृद्ध प्रदेश है। यह बात अलग है कि पिछले विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा ने ‘समृद्ध मध्यप्रदेश यात्राएं’ निकाली थीं, लेकिन नतीजे कुछ और आए। फिर भी अपना मध्यप्रदेश समृद्ध, स्वर्णिम और आत्मनिर्भर बने, यह कौन नहीं चाहेगा। इसके लिए प्रशासकीय कुशलता के साथ राजनीतिक संकल्प भी चाहिए। लेकिन ये दोनों तो पहले भी थे। फिर भी नीति, नीयत और हकीकत में डिस्टेंसिंग कहां और क्यों रही, इसका जवाब भी संकल्प के साथ नत्थी हो तो अच्छा।