अजय बोकिल

आज राजनीतिक मुहावरा बन चुके ‘सुशासन’ और ‘स्वदेशी’ जैसे शब्दों के संदर्भ में हम में से बहुत कम को पता है कि एक ठोस और प्रभावी आंदोलन के रूप में इसकी नींव आज से सौ साल पहले महात्मा गांधी के नेतृत्व में ‘असहयोग आंदोलन’ के रूप में रखी गई थी। विदेशी सत्ता के खिलाफ यह देश का यह पहला सर्वसमावेशी और व्यापक आंदोलन था, जिसने पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक हर भारतीय को विदेशी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले सिपाही में तब्दील कर ‍दिया। हालांकि ‘अहिंसा’ का आग्रही यह आंदोलन बाद में खुद हिंसा का ‍शिकार हो गया,  लेकिन इसने ‍भविष्य में देश के आजाद होने की उम्मीदों की पक्की नींव डाल दी।

आजकल ये दो शब्द ‘स्वदेशी’ और सुशासन’ हमें बार-बार और अलग-अलग संदर्भों में सुनाई देते हैं। इनकी रेंज राजनीतिक-प्रशासनिक सुशासन से लेकर ई-सुशासन तक है। लेकिन इनकी आत्मा वैसी नहीं है, जो असहयोग आंदोलन में गूंजे ‘स्वशासन’ और ‘स्वदेशी’ की थी। बतौर एक राजनीतिक फैशन आजकल सभी सरकारें अपनी कार्यशैली का औचित्य ठहराने ‘सुशासन’ का नारा देती हैं। लेकिन एक सदी पहले इसी नारे ने समूचे देश के हर तबके में एक नया लड़ाकूपन भर दिया था। फर्क इतना है कि इसकी शुरुआत सुशासन के बजाए ‘स्वशासन’ (सेल्फ रूल) की मांग के रूप में हुई थी।

इसके लिए गांधीजी के अगुवाई में कांग्रेस ने ब्रिटिश सत्ता को नकारने का आंदोलन शुरू किया। इसकी पृष्ठभूमि में अमृतसर में जलियांवाला बाग नरसंहार, अत्याचारी रौलट एक्ट, मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों का विरोध तथा प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की में खिलाफत की समाप्ति था। यूं अंगरेजी सत्ता के खिलाफ आंदोलन पहले भी हुए थे, लेकिन गांधीजी के नेतृत्व में होने वाला यह आंदोलन उनके सत्य और अहिंसा के राजनीतिक प्रयोग का प्रीक्वल था। गांधीजी ने इसे ‘सत्याग्रह’ कहा।

अंग्रेज सरकार के खिलाफ इस असहयोग आंदोलन की शुरुआत 5 सितम्बर 1920 को हुई और यह आंदोलन चार चरणों में फरवरी 1922 तक चला। हालांकि ‘असहयोग आंदोलन’ अपने लक्ष्यों को भले हासिल न कर पाया हो, लेकिन इसने स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में समाज के हर वर्ग की भूमिका सुनिश्चित कर दी। इसी ने भविष्य के कई आंदोलनों के प्रेरक बिंदु भी तय कर दिए। इसकी शुरुआत अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को बांटी गई पदवियों और खिताबों को लौटाने से हुई। देश की तत्कालीन कई दिग्गज हस्तियों ने विरोधस्वरूप अपनी पदवियां लौटाकर अंग्रेजी सत्ता के प्रति अपना मुखर विरोध दर्ज कराया।

हालांकि ऐसे कुछ प्रयास आजादी के बाद भी अलग-अलग मुद्दों पर सत्ता का विरोध जताने के लिए हुए, लेकिन उनमें वो ताकत और ताब नहीं दिखी, जो असहयोग आंदोलन की ज्वाला में थी। क्यों‍कि वह केवल विदेशी सत्ता के खिलाफ वैचारिक विरोध ही नहीं था बल्कि गुलामी, शोषण और हर प्रकार के अत्याचार के खिलाफ भी था। इस आंदोलन में नवीनता यही थी कि यह ‘ईंट का जवाब पत्थर’ से देने के बजाए ‘शूल का जवाब फूल’ से देने में यकीन रखता था। इसी आंदोलन ने उस स्वदेशी की भी बुनियाद को मजबूत किया, जिसे आज चीनी माल के ‍बहिष्कार के रूप में अप्लाई किया जा रहा है।

उसी दौरान इंग्लैंड में मशीन से बने कपड़े व अन्य वस्तुओं का बहिष्कार शुरू हुआ और उसकी जगह हाथ से बुनी खादी ने ले ली। इसका असर इतना व्यापक था कि खादी महज एक वस्त्र से विचार और देशभक्ति के प्रतीक में तब्दील हो गई। कहते हैं कि काल अपना चक्र पूरा करता है। तारीखें भले बदल गई हों, ‘स्वशासन’ और ‘स्वदेशी’ जैसे शब्द नए हालात में अपनी प्रासंगिकता फिर खोज रहे हैं। फर्क इतना है कि गांधी ने तब ‘स्वशासन’ की बात की थी, आज ‘सुशासन’ की बात की जा रही है। हालांकि इन सौ सालों में देश ‘स्व’ और ‘सु’ के भावार्थ को ठीक से न तो समझ पाया है और न ही इसके अंतर को पाट सका है।

यह भी विडंबना है कि 15 अगस्त 1947 को आजादी (स्वशासन) हासिल होने के बाद भी हमें ‘सुशासन’ की दुहाई बार-बार देनी पड़ रही है, क्योंकि वह अभी भी ‘मृग मरीचिका’ की तरह ही है। दरअसल ‘स्वशासन’ को ‘सुशासन’ में बदलने के राजनीतिक प्रयोगों में बुनियादी नैतिक ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता चाहिए। गांधी के स्वशासन की परिकल्पना इन्हीं तत्वों पर आधारित थी। स्वतंत्रता की 73 वीं सालगिरह पर इस पर आत्मचिंतन जरूरी है कि क्या स्वशासन को सुशासन में रूपांतरित करने की वांछित ईमानदारी हममें है?