गिरीश उपाध्‍याय 

ऐसी उत्साहजनक और संभावनाएं जगाने वाली खबरें आजकल थोड़ी कम ही आती हैं। जब मैंने यह खबर पढ़ी कि खुदकुशी करना अब अपराध नहीं रहेगा तो मन प्रसन्न हो गया। अगर आप जरा गौर से देखें तो, पाएंगे कि खुदकुशी में ‘खुशी‘ शब्द बहुत ही बारीकी से गुंथा हुआ है। और गुंथा क्या है इस शब्द का मध्य भाग यदि निकाल दें तो आदि और अंत मिलकर खुदकुशी को खुशी में बदल देते हैं।

खुदकुशी को अकसर गंभीर तनाव, अवसाद, अपराधबोध से ग्रस्त होने आदि का परिणाम माना जाता है। और सरकार ने आत्महत्या की ऐसी कोशिशों को कानून के हिसाब से अपराध न मानने का फैसला किया है। इस संबंध में लाए गए ‘मेंटल हेल्थ केयर बिल‘ को राज्यसभा ने मंजूरी दे दी है। अब यह बिल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाएगा। इस बिल में प्रावधान है कि खुदकुशी करने वालों को प्रताड़ित करने के बजाय उन्हें चिकित्सकीय देखभाल मुहैया कराई जाए। हमारे कानून बनाने वालों ने देर से ही सही लेकिन अब जाकर यह मान लिया है कि खुदकुशी करने वाला दरअसल तनाव और अवसाद आदि का शिकार होता है और उसे सहानुभूति व देखभाल की जरूरत होती है। इसलिए उसे सजा की जगह उपचार मिलना चाहिए। अभी आत्महत्या करने या उसकी कोशिश को अपराध माना जाता है और ऐसा करने वालों पर आईपीसी की धारा 309 के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया जाता है।

संसद की इस कोशिश को सलाम करते हुए मैं अपनी कुछ जिज्ञासाएं शेयर करना चाहता हूं। सबसे पहले कुछ प्रसंग ले लें। देश में लंबे समय से दो तीन तरह की आत्महत्याएं या आत्महत्या की कोशिशें सर्वाधिक चर्चा में हैं। अगर इनका वर्गीकरण करें तो मैं सबसे पहले किसानों की आत्महत्या, फिर पढ़ाई के दबाव से की जाने वाली छात्रों की आत्महत्या, फिर दुष्कर्म से पीड़ित होने वाली युवतियों की आत्महत्या को ऊपर रखना चाहूंगा। ये वर्ग जिन कारणों से अपनी जान देते हैं, वे ज्यादातर व्यक्तिगत नहीं, बल्कि किसी अन्य की वजह से पैदा होते हैं। ऐसे में इन्हें अपराधी मानना वास्तव में उनकी पीड़ा को और अधिक गहरा करना है। व्यक्ति अपने जीवन को नष्ट करने जैसा फैसला साधारण परिस्थिति या सामान्य मानस में रहकर नहीं करता। इसलिए आवश्यक है कि उनके अमूल्य जीवन को बचाने के लिए समाज जो भी कर सकता हो करे। लेकिन विडंबना यह है कि बजाय उन व्यक्तियों या परिस्थितियों के, जो ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं, हम उनके शिकार को ही अपराधी मानने लगते हैं। हालात का शिकार बन जाने वाला व्यक्ति तो अपना जीवन खो बैठता है लेकिन अधिकांश मामलों में उन लोगों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती जो आत्महत्या के कारणों के लिए जिम्मेदार होते हैं।

अब किसान की फसल यदि खराब बीज, खाद या कीटनाशक के कारण बर्बाद हुई है और उसके चलते यदि उसने आत्महत्या की कोशिश की है तो आप ही बताइए कि काउंसलिंग या उपचार उस व्यवस्था का होना चाहिए या उस व्यक्ति का। पढ़ाई के दबाव या तनाव के कारण कोई छात्र आत्महत्या करे तो वैसी स्थिति में सुधार की जरूरत सबसे पहले कहां होनी चाहिए, उस सिस्टम में या उस छात्र में? दुष्कर्म का शिकार होने पर यदि कोई युवती ऐसा कदम उठाए तो काउंसलिंग या उपचार पहले किसको मिलना चाहिए? ये जो उदाहरण मैंने दिए हैं, इनमें से सभी में अधिकांश मामलों में व्यक्ति जिम्मेदार नहीं होता बल्कि समाज और परिस्थितियां जिम्मेदार होती हैं। इसलिए मेरा मानना है कि पहली जरूरत उन परिस्थितियों और समाज को बदलने की है, जो ऐसे मामलों में उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं। संसद की पहल का स्वागत करते हुए मैं इस ओर भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि, कहीं ऐसा न हो कि ऐसे किसी व्यक्ति को तनाव और अवसाद का शिकार बताकर, उपचार के बहाने, एक तरह से उसे मनोरोगी करार देते हुए, उसकी बाकी जिंदगी भी नर्क बना दी जाए।

ये तो हुई व्यक्ति की बात। लेकिन देश का क्या? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इन दिनों देश भी आत्महत्या करने को विवश है। उसकी मिट्टी में जिस तरह के बीज, खाद और कीटनाशक डाले जा रहे हैं, उसे जिस तरह के पाठ पढ़ाए जा रहे हैं और उसके साथ जिस तरह दिन रात दुष्कर्म हो रहा है, क्या उसको कोई देख पा रहा है? जिस तरह का व्यवहार इस भारत अर्थात इंडिया से हो रहा है क्या उससे ज्यादा प्रताड़ित और पीड़ित कोई और होगा? समूची व्यवस्था और समाज मिलकर क्या इस देश को आत्महत्या की ओर नहीं धकेल रहे? क्या देश से अधिक तनाव, अवसाद या आत्मग्लानि से पीड़ित कोई और होगा? व्यक्तियों के बारे में तो संसद बिल लेकर आ गई है, लेकिन इस देश को जिस उपचार की जरूरत है, जिस देखभाल की जरूरत है, उसकी व्यवस्था करने वाला बिल यह संसद और संसद में बैठे हमारे माननीय सदस्यगण कब लेकर आएंगे?