अजय बोकिल

इंसान की नजर में ‘कीड़े मकोड़े’ भले एक गाली हो, लेकिन दुनिया के इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तं‍त्र) में उनकी अहम हिस्सेदारी रहती आई है। पिछले कुछ सालों से पारिस्थितिकी ये पहरेदार तेजी से खामोश मौत मर रहे हैं। पूरी दुनिया में ऐसे छोटे जीव-जंतुओं की आबादी तेजी से घटती जा रही है। जबकि ये सूक्ष्म जीव जंतु पृथ्वी पर वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र (ग्लोबल इकोसिस्टम) व पर्यावरण को कायम रखने में बड़ी भूमिका निभाते आ रहे हैं। शहरों में उग रहे सीमेंट के बेलगाम जंगलों में अब केवल चींटियां, दीमकें, चींटे जैसे जंतु ही दिखाई पड़ जाते हैं।

गांवों-खेतों में भी बहुत सारे कीड़े-मकोड़े, जो आज से तीन दशक पहले तक अक्सर नजर आते थे, गायब हो गए हैं। दुर्भाग्य से मानव सभ्यता के विकास ने इन कीड़े-मकोड़ों को भी लील लिया है। लीलता जा रहा है। ताजा अध्ययन बताते हैं कि कीड़े-मकोड़ों की ये आबादी हर दशक में 10 से 20 फीसदी तक कम हो रही है। टीडब्लूसी इंडिया में हाल में छपी रिपोर्ट बताती है कि ये छोटे जीव-जंतु पृथ्‍वी पर लाखों सालों से अनेकानेक प्रजातियों के रूप में विचरण करते आ रहे हैं। उनका एक ‍निश्चित जीवन चक्र और प्रकृति में एक सीमित लेकिन तयशुदा भूमिका रहती आई है। लेकिन अब इनके वजूद को ही गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में वैज्ञानिको ने अब तक जीव-जंतुओं की 10 लाख प्रजातियां खोजी हैं। माना जाता है कि करीब 40 लाख प्रजातियां और भी हैं, जिनके बारे में हमें अभी पता नहीं है। यूं मानव सभ्यता के विकास के बहुत पहले से पृथ्वी पर रहने वाले इन जीव-जंतुओं के वजूद और जीवन को खतरा पैदा हो ही रहा था, लेकिन प्रौद्योगिकी के तेजी से विकास और बदलाव तथा मनुष्य की स्वार्थी जीवन शैली व सोच ने इन अकिंचन से जीवों को ही मिटाना शुरू कर दिया है।

जरा याद करें आपने कब से झींगुर की किर्र-किर्र नहीं सुनी। गुबरैले तो अब अजायबघर की वस्तु बन चुके हैं। रंगबिरंगी तितलियां कभी उड़ती दिख जाएं तो खुशी से ज्यादा हैरानी होती है। सांप तो फिर भी निकल आते हैं, लेकिन जमीन को उपजाऊ बनाने वाले केंचुए तकरीबन गायब हैं। पक्षी भी गिने चुने ही दिखते हैं। सर्दियों में सुबह की धूप सेंकती, बिजली के तारों पर लगने वाली परिंदों की पाठशाला भी अब एक दुर्लभ लेकिन अविस्मरणीय अनुभव है। बच्चे भी आजकल ज्यादातर जीव जंतुओं को ऑन लाइन किसी साइट पर देखते हैं। उन्हें चलते, रेंगते, देखने या छूने का अहसास उनके पास नहीं है।

जंतु शा‍स्त्रियों के मुताबिक जीव जंतुओं का इस तरह लुप्त होना विश्वव्यापी है। बताया जाता है कि जीव जंतुओं की दो फीसदी आबादी हर साल विलुप्त हो रही है। जिसका विपरीत असर हमारे पर्यावरण संतुलन पर पड़ रहा है। दुनिया के जाने-माने जंतुशास्त्री डॉ. डेविड वैगनर के अनुसार ‘बीते एक दशक में हमने 10 से 20 फीसदी तक अपने सूक्ष्म जंतुओं को खो दिया है। हम जीवन की यवनिका की ही धज्जियां उड़ा रहे हैं।‘

साल 2020 में आई वैश्विक जीव-जंतु आकलन रिपोर्ट में बताया गया था कि विगत 30 वर्षों में कीड़े-मकोड़ों की आबादी में 25 फीसदी तक की गिरावट आ गई है। पृथ्वी पर इनकी संख्या हर साल 1 प्रतिशत की दर से कम हो रही है, इनमें पक्षी, स्तनधारी और सरीसृप जैसे प्राणी शामिल हैं। ज्यादातर जीवविज्ञानी इस बात पर सहमत हैं कि विश्व अब सामूहिक विलुप्ति घटनाक्रम के छठे दौर में पहुंच गया है।

सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है? जानकारों के मुताबिक जीव जंतुओं पर यह मार कई तरह से पड़ रही है। उन्हें अपना प्राकृतिक जीवन जीना दूभर हो गया है। जीव जंतुओं के विनाश का एक प्रमुख कारण तो जलवायु परिवर्तन और उनके प्राकृतिक आवासों का विनाश है। इसके अलावा तेजी से हो रहा शहरीकरण, ज्यादा उत्पादन के लालच में फसलों पर कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग, बढ़ता प्रदूषण, कृषि भूमि का विस्तार तथा जंगलों का लगातार खत्म होते जाना है। जबकि पर्यावरण को कायम रखने में हर जीव की अपनी एक भूमिका और योगदान होता है। यह श्रृंखला तेजी से टूटती जा रही है।

सच तो यह है कि मनुष्य प्राकृतिक आपदाओं को काल समझता है, लेकिन इन लाखों सूक्ष्म जीव जंतुओं के लिए तो मनुष्य ही काल बन गया है। जर्मनी में तो दो साल पहले सरकार ने बाकायदा जीव जंतु सरंक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किया है। ब्रिटेन में भी ऐसी ही मांग तेजी से उठ रही है। जहां तक भारत का सवाल है तो हमारे यहां इसका कोई प्रामाणिक डाटा उपलब्ध नहीं है कि कितने जीव जंतुओं का बीते सालों में समूल विनाश हुआ है। कितने जीव जंतुओं के समाप्त होने की प्रक्रिया यहां भी जारी है। जिसका सीधा असर जैव विविधता पर भी पड़ रहा है।

लीफहापर्स (टिड्डों) की एक पूरी जाति ही समाप्त हो चुकी है। सूक्ष्म जीवों की कुछ और प्रजातियां भी इसी राह पर हैं। कीटों का इस तरह गायब होना मनुष्य की खाद्य आदतों पर भी विपरीत असर डाल रहा है। बताया जाता है कि दुनिया भर में जीव जंतुओं की करीब 1500 प्रजातियां ऐसी हैं, जिन्हें 113 देशों के 3 हजार से अधिक नस्ली समुदायों द्वारा खाया जाता है। इनमें ग्रासहॉपर, सिकाडा, चीटियां, बीटल, केटरपिलर आदि शामिल हैं।

हैरानी की बात यह है कि भारतीय परंपरा और खासकर हिंदू पुराणों में कुछ पशुओं को विशेष महत्व मिला है, उन्हें देवता के समकक्ष माना गया है, लेकिन लाखों सूक्ष्म जीव-जंतुओं का खास महत्व नहीं है। केवल भगवान दत्तात्रय चींटी जैसे सूक्ष्म जंतुओं से शिक्षा लेते दिखते हैं। लेकिन ये जीव समूचे पारिस्थितिकी तंत्र की अहम कड़ी हैं, इसका संज्ञान शायद ही मिलता है। यहां तक कि जीव जंतुओं की संख्या को लेकर भी हमारे यहां 84 लाख योनियों का जिक्र है। विज्ञान अभी तक 10 योनियों (प्रजातियों) का ही पता लगा पाया है।

हमारे यहां जीव हत्या को भले ही पाप माना गया हो लेकिन विडम्बना यह है कि एक तरफ हम पूरी पृथ्‍वी पर विचरण करने वाले जीव जंतुओं की सही संख्या भी अभी तक नहीं जान पाए हैं, उसके पहले ही उनकी आबादी विलुप्त होने का रंज मनाने पर विवश हैं। हमने कीड़े मकोड़ों को हमेशा नकारात्मक और तंज के अर्थ में लिया है। लेकिन कीड़े मकोड़ों के पास भाषा होती तो वो इंसान को न जाने क्या कहते?

वो इंसान जो समूची कायनात में से इन जीव जंतुओं की हिस्सेदारी को ही खत्म करने पर आमादा है। जो हो रहा है, वह पृथ्वीतल पर न केवल मनुष्य बल्कि जीव मात्र के अस्तित्व पर मंडराते गंभीर खतरे की ओर इशारा करता है। यही हाल रहा तो शायद स्वार्थी मनुष्य एक दिन इकलौता ही पृथ्वी पर बच रहेगा। और वह दुनिया में अकेला रह भी  जाएगा तो खाक जिंदगी जीएगा।

सवाल यह है कि यदि यह सृष्टि ईश्वर ने भी रची हो तो मनुष्य को दूसरे जीवों की कीमत पर जीने का अधिकार किसने दिया? जीव जंतुओं का यह विनाश सीधे तौर पर मानव सभ्यता के लिए भी खतरे की घंटी है। कीड़े-मकोड़े अकेले नहीं मरते। इंसानियत की ख्वाहिशों का अंत भी शायद इसी तरह से होता है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है- ख्वाहिशें कीड़े मकोड़ों की तरह मरने लगीं, खुदकुशी की वारदातों का ये मंजर तू भी देख।