अजय बोकिल

भारत सहित विश्व के 50 से ज्यादा देशों में गूंजे पेगासस जासूसी कांड की जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति द्वारा किए जाने को कुछ लोग ‘न्यायिक सक्रियता’ से जोड़कर भी देख सकते हैं, लेकिन अगर ये ‘न्यायिक सक्रियता’ है तो भी स्वागतेय है। विपक्ष और कानूनविदों ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का स्वागत करते हुए इसे ‘ऐतिहासिक’ बताया है। उन्होंने कहा कि इससे पेगासस मामले में सच सामने आ जाएगा कि भारत सरकार ने निजता की रक्षा के कानून का उल्लंघन किया है या नहीं।

इस पूरे मामले में मोदी सरकार का रवैया टालमटोल और अजब चुप्पी भरा रहा है। सरकार यह तो कहती रही है कि उसने किसी की जासूसी नहीं कराई। अगर उसने नहीं कराई तो फिर किसने, क्यों और किसके आदेश से कराई, यह जानने का हक देश के हर नागरिक को है। और यह भी कि देश में संवैधानिक सरकार के अलावा वो कौन सी समानांतर ताकत है, जो किसी की भी जासूसी करवा सकती है?

विपक्ष सहित पेगासस जासूसी का शिकार हुए कई लोगों ने मांग की कि इस पूरे मामले का खुलासा होना चाहिए। लेकिन सरकार ने पहले तो जासूसी से ही इंकार किया। तब लोग इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए। सरकार ने कोर्ट में हलफनामा देकर विशेषज्ञों की एक समि‍ति जांच की बात कही। हलफनामे में कहा कि कुछ ‘निहित स्वार्थों‘ द्वारा दिए किसी भी गलत विमर्श को दूर करने और उठाए गए मुद्दों की जांच करने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाएगा। इस पर याचिकाकर्ताओं को आपत्ति थी।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका वरिष्ठ पत्रकार एन. राम, शशि कुमार, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, पेगासस स्पायवेयर के पीड़ित पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता, एसएनएम अब्दी और स्पायवेयर के प्रेम शंकर झा, रूपेश कुमार सिंह आदि ने लगाई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि पहले सरकार यह स्पष्ट करे कि उसने पेगासस का इस्तेमाल किया है या नहीं?

सरकार के जवाब के बाद याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से आग्रह किया कि वो इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराए। कोर्ट ने उसके द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति को पेगासस जासूसी मामले में सात बिंदुओं पर जांच करने और महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देने मात्र से न्यायालय मूक दर्शक बना नहीं रह सकता। कोर्ट के आदेश पर भाजपा की सधी हुई प्रतिक्रिया थी कि यह आदेश मोदी सरकार के कोर्ट में दिए हलफनामे के अनुरूप ही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रवींद्रन ‘साइबर सुरक्षा, डिजिटल फॉरेंसिक, नेटवर्क और हार्डवेयर’ समिति के कामकाज की निगरानी करेंगे। समिति के तीन सदस्य नवीन कुमार चौधरी, प्रभारन पी. और अश्विन अनिल गुमस्ते हैं। समिति को जल्द रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कहा गया है।

समिति मुख्य रूप से सात बिंदुओं पर जांच करेगी। ये हैं- इस तरह के स्पायवेयर हमले के शिकार लोगों या पीड़ितों में कौन-कौन शामिल हैं? साल 2019 में पेगासस स्पायवेयर के जरिये भारतीय नागरिकों के वॉट्सऐप हैक किए जाने की खबरें आने के बारे भारत सरकार ने इस संबंध में क्या कदम उठाए हैं? क्या भारत सरकार या राज्य सरकार या भारत की किसी केंद्रीय या राज्य एजेंसी ने पेगासस स्पायवेयर खरीदा है, जिसे भारतीय नागरिकों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके, क्या भारत की किसी सरकारी एजेंसी ने नागरिकों पर पेगासस स्पायवेयर का इस्तेमाल किया गया है, और यदि ऐसा हुआ है तो वह किस कानून, नियम, दिशानिर्देश, प्रोटोकॉल या कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया था? क्या किसी घरेलू व्यक्ति या संस्था ने भारतीय नागरिकों पर पेगासस का इस्तेमाल किया है, यदि ऐसा है, तो क्या इसकी स्वीकृति दी गई थी?

इसके अलावा समिति अपनी जरूरत और सुविधानुसार इस केस से जुड़े किसी भी अन्य मामले पर विचार कर उसकी जांच कर सकती है। उल्लेखनीय है कि भारत के कुछ मीडिया अधिष्ठानों सहित 17 अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कंसोर्टियम ने पेगासस प्रोजेक्ट के तहत इस साल अगस्त में यह खुलासा किया था कि इजरायल की एनएसओ ग्रुप कंपनी के पेगासस स्पायवेयर के जरिये नेता, पत्रकार, कार्यकर्ता, सुप्रीम कोर्ट के अधिकारियों के फोन को कथित तौर पर हैक कर उनकी निगरानी की गई या वे संभावित निशाने पर थे। फ्रांस स्थित गैर-लाभकारी संस्था फॉरबिडेन स्टोरीज ने लीक हुए एक ऐसे डेटाबेस को प्राप्त किया था जिसमें दुनियाभर के 50 हजार से अधिक लोगों के नंबर थे और इनकी पेगासस के जरिये निगरानी कराने की संभावना है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने सूची में शामिल भारत के कुछ लोगों के फोन का फॉरेंसिक विश्लेषण किया है, जिसमें से 10 से अधिक लोगों की पेगासस के जरिये फोन हैकिंग की पुष्टि हुई। खास बात यह है कि भारत में जिन लोगों की जासूसी की गई, उनमें सत्तारूढ़ भाजपा के भी कुछ लोग हैं। इस पूरे मामले पर संदेह तब और गहराया जब स्पायवेयर बनाने वाली कंपनी ‘एनएसओ ग्रुप’ ने सफाई दी कि वह यह सॉफ्‍टवेयर केवल सरकारों को ही बेचती है। इस पर भारत सरकार ने न तो ‘हां’ कहा और न ‘ना कहा। जबकि सरकार के रक्षा व आईटी मंत्रालय ने पेगासस स्पायवेयर के इस्तेमाल से इनकार कर दिया।

इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक केएन गोविंदाचार्य ने भी जासूसी के कथित आरोपों पर फेसबुक, वॉट्सऐप और पेगासस स्पायवेयर निर्माता एनएसओ समूह के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज कराने और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) जांच की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पेगासस कांड के खुलासे के बाद पूरी दुनिया में तहलका मच गया। कुछ सरकारों ने इसकी जांच भी शुरू करा दी। कैंम्ब्रिज विश्वविदयालय ने यूएई के साथ अपने 4125 करोड़ रुपये के समझौते को रद्द कर दिया। क्योंकि यूएई पर आरोप है कि उसने ब्रिटेन के कई नंबरों को निगरानी के लिए निशाने पर लिया था। फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों ने इजरायली प्रधानमंत्री से बात की। इजराइल ने ऐसी किसी जासूसी से इंकार किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेषज्ञों ने पेगासस स्पायवेयर तकनीक की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की।

उल्लेखनीय है कि जिन लोगों की जासूसी हुई, उनमें से 161 भारतीयों के नाम उजागर हो चुके हैं। इस पूरे जासूसी कांड का भंडाफोड़ करने वाली पेरिस स्थित गैर लाभकारी संस्था फॉरबिडेन स्टोरीज व अन्य 17 समाचार संगठनों के कंसोर्टियम को पत्रकारिता के प्रतिष्ठित डाफ्ने करुआना पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यहां यह भी गौरतलब है कि पेगासस स्पायवेयर इजराइल की साइबरआर्म फर्म एनएसओ ग्रुप बनाती है। इस जासूसी उपकरण को उन मोबाइल फोनों में आसानी से फिट किया जा सकता है, जो आईओएस 14.6 और एड्रांयड वर्जन पर चलते हैं।

इस स्पायवेयर के जरिए निगरानीकर्ता सम्बन्धित व्यक्ति के सारे टैक्स्ट मैसेज, पासवर्ड, कॉल ट्रेक और लोकेशन ट्रैक कर सकता है। इसके लिए पेगासस एक खास तरह का ‘कंमाड एंड कंट्रोल सिस्टम’ मोबाइल में इंस्टाल कर देती है। सामने वाले को पता भी नहीं चलता। दरअसल पेगासस ग्रीक माइथॉलाजी में पंख के जरिए उड़ने वाले घोड़े का नाम है। बताया जाता है कि दुनिया की कई सरकारों ने अपने विरोधियों की जासूसी के लिए इस स्पायवेयर को खरीदा है। पहली बार इसका पता 2016 में लगा था, जब एक अरब मानवाधिकार कार्यकर्ता की जासूसी हुई। अमेरिकी अरब पत्रकार जमाल खशोगी, जिनकी हत्या कर दी गई, की भी पेगासस के मार्फत सउदी अरब सरकार जासूसी करा रही थी। दो साल पहले फेसबुक ने भी एनएसओ के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था कि वो भारत में चु‍निंदा लोगों के व्हाट्सएम मैसेज इंटरसेप्ट कर रहा है। मेक्सिको में तो पेगासस का इस्तेमाल ड्रग माफिया द्वारा पत्रकारों के खिलाफ करने की खबर आई थी।

पेगासस स्पायवेयर खरीदना सब के बस की बात नहीं है। ‘द गार्जियन’ अखबार ने हमें बताया था कि एनएसओ पेगासस सरकारी एजेंसियों से लक्षित प्रति 10 आईफोनों में यह स्पायवेयर इंस्टाल करने के लिए 4 करोड़ 82 लाख रुपये तथा 10 एंड्रायड फोनो में इंस्टाल करने के 3 करो़ड़ 74 लाख रुपये चार्ज करती है। जाहिर है कि इतनी महंगी जासूसी सरकारें या मल्टीनेशनल कंपनियां ही करा सकती है।

भारत में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के संदर्भ में सवाल यह है कि क्या तीन सदस्यीय समिति निष्पक्ष तरीके से जांच कर पाएगी? उसे सरकार का सहयोग कितना मिलेगा? अगर यह जासूसी सरकार ने ही कराई है तो वो यह राज क्यों उजागर होने देगी? यदि सरकार ने नहीं कराई है तो वो कौन है, जो इतना ताकतवर है? इन सब बातों के खुलासे होने जरूरी हैं।  भारत में पेगासस कांड एक राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी इसको लेकर मोदी सरकार पर हमले करते रहे हैं। लेकिन असल सवाल आम नागरिक की निजता की सुरक्षा का है। लोकतंत्र में इसे बाधित करने का अधिकार किसी को नहीं है। अलबत्ता जांच समिति के निष्कर्ष राजनीतिक बवंडर पैदा करेंगे, यह तय है। आगे-आगे देखिए, होता है क्या? (मध्यमत)
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