राकेश अचल

अफगानिस्तान को पाषाणयुग में पहुँचाने वाले तालिबान की क्रूरता से अब कोई अनजान नहीं है। तालिबानियों की क्रूरता अब लगता है कि अपना-पराया कुछ नहीं देख रही। संगदिली की रोज नयी इबारत लिखने वाले तालिबानियों के आगे महाबली अमेरिका भी लगता है हथियार डाल चुका है। अब तालिबानियों का मुकाबला इंसानियत से है। तालिबानी क्रूरता के मारे इंसानियत कराह रही है। कम से कम एशिया में तो लोगों के लिए तालिबान एक बुरे ख्वाब की तरह हैं।

तालिबान क्रूरता का दूसरा नाम बन गया है। बीते रोज एक भारतीय पत्रकार की नृशंस हत्या करने के बाद अफगानिस्तान में खुशियां बिखेरने वाले हास्य कलाकार नजर मोहम्मद को तालिबानियों ने जानवरों की तरह घर से खींचकर मार डाला। कांधार पुलिस के सिपाही रह चुके नजर मोहम्मद की तालिबानियों से कोई जाती दुश्‍मनी नहीं थी। तालिबानी अगर नजर से कोई अदावत रखते थे तो इसकी इकलौती वजह ये थी कि नजर मोहम्मद खून आलूदा अफगानी जनता को हंसाने का काम करता था। तालिबानियों की नजर में लोगों को हंसाना गुनाह है  और गुनाहगार को सजा देना तालिबानों का परम धर्म है। तालिबान को ज़िंदा तो क्या बामियान में बुद्ध की मूर्तियां तक परेशान करती थीं। तालिबान ने अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बावजूद  बामियान में बुद्ध की सबसे बड़ी प्रतिमाओं को बारूद से उड़ा दिया था।

तालिबान का क्रूर चेहरा और चरित्र समझने के लिए आपको अतीत में झांकना पडेगा। आपको याद होगा कि 1996 से लेकर 2001 तक अफगानिस्तान में तालिबानी शासन था और इस दौरान मुल्ला उमर देश का सर्वोच्च धार्मिक नेता हुआ करता था। मुल्ला उमर सुप्रीम काउंसिल का खुदमुख्तार बना हुआ था। तालिबान आन्दोलन को सिर्फ पाकिस्तान,  सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने ही मान्यता दे रखी थी।

अमेरिका की मदद से अफगानिस्तान में तालिबान को 2001 में सत्ता से बेदखल तो कर दिया गया, लेकिन उनका समूल खात्मा नहीं किया जा सका। पिछले दिनों अमेरिका के नए राष्ट्रपति ने जैसे ही अफगानिस्तान से अपनी सेनाएं वापस बुलाईं तालिबान ने अपने खुनी पंजे एक बार फिर से फैलाना शुरू कर दिए। मात्र दो महीने में तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के एक बड़े इलाक़े को अपने कब्ज़े में ले लिया है। साल 2001 के बाद से तालिबान के कब्ज़े में इतना बड़ा इलाक़ा कभी नहीं रहा।

संगदिल तालिबान दरअसल इस्लामिक कट्टपंथी राजनीतिक आंदोलन हैं। तालिबान का उभार अफगानिस्तान से रूसी सैनिकों की वापसी के बाद 1990 के दशक की शुरुआत में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ था। ऐसी धारणा है कि कट्टर सुन्नी इस्लामी विद्वानों ने धार्मिक संस्थाओं के सहयोग से पाकिस्तान में इनकी बुनियाद खड़ी की थी। लेकिन कालांतर में यही तालिबान पाकिस्तान के लिए भी ‘भस्मासुर’ साबित हो रहा है।

अफगानिस्तान में लोकतंत्र बहाली की जितनी भी कोशिशें बीते दो दशकों में हुईं, उन्हें इसी तालिबान ने नाकाम कर दिया। हर बार तालिबान का बारूद इन कोशिशों को भस्म करता रहा। यहां तक कि 20 साल लगातार तालिबानियों की गर्दन पर अपने फ़ौजी बूट रखकर खड़ा रहा अमेरिका भी तालिबान को समूल नष्ट नहीं कर पाया। अमेरिका ने तालिबान के बड़े नेता मुल्ला उमर को 2016 में मार गिराया। लेकिन तालिबानी संगठन और सोच लगातार ज़िंदा रही। मुल्ला उमर के बाद यह संगठन हिब्दुल्ला खुनजादा की अगुवाई में आगे बढ़ता गया।

इंसानियत के दुश्मन तालिबान की असली ताकत खाड़ी देशों खासकर सऊदी अरब से मिलने वाला पेट्रोल का पैसा है। ये आरोप नहीं बल्कि जगजाहिर तथ्य है। माना जाता है कि 2011 में इस संगठन की वार्षिक आय लगभग 28 अरब रुपये थी, जो अब बढ़कर 105.079 अरब रुपये से भी ज्यादा होने का अनुमान है। अफगानी तालिबान कोई सूखे मेवे बेचकर मोटा नहीं हुआ। तालिबान पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पार नशे का जाल बिछाकर कमाई करने का भी आरोप है। तालिबान का देश की खनिज सम्पदा पर भी पूरा कब्जा है।

आपको मालूम होना चाहिए कि अफ़ग़ानिस्तान दुनिया में अफ़ीम का सबसे बड़ा उत्पादक है। यहां जितनी अफ़ीम हर साल पैदा होती है उसे निर्यात किया जाए तो 105 से 210 अरब रुपये की धनराशि पैदा होगी। अफगानिस्तान से रिस कर आने वाली खबरों के मुताबिक तालिबान इस व्यापार के अलग-अलग स्तरों पर टैक्स लेता है। अफ़ीम की खेती करने वाले किसानों से 10 प्रतिशत उत्पादन टैक्स लिया जाता है। इसके बाद अफ़ीम को हेरोइन में बदलने वाली प्रयोगशालाओं से भी टैक्स लिया जाता है। यही नहीं,  इस अवैध व्यापार को करने वाले व्यापारियों से भी टैक्स वसूला जाता है। इस तरह इस व्यापार में हर साल तालिबान का हिस्सा लगभग 7 अरब रुपये से लेकर 28 अरब रुपये के बीच होता है।

खून रंगे हाथों वाले तालिबानियों को समझाना या उन्हें कट्टरवादिता से मुक्त करना आसान नहीं है। वर्ष 2018 के अगस्त महीने में अमेरिका ने दावा किया था कि उसने अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद संभावित चार सौ से पांच सौ प्रयोगशालाओं को ध्वस्त कर दिया है जिनमें से आधी से ज़्यादा दक्षिणी हेलमंड प्रांत में थीं। इसके साथ ही ये भी दावा किया गया कि हवाई हमले ने तालिबान को ख़त्म कर दिया है। तालिबानी बाहर की दुनिया को नरपिशाच जैसे दिखाई देते हैं,  और वे हैं भी, लेकिन इलाकाई सियासत उन्हें बीच-बीच में प्राणवायु (ऑक्सीजन) दे देती है।

आजकल सारी दुनिया का ध्यानआकर्षित करने वाले अफगानिस्तान के पास वो सब कुछ है जो किसी संप्रभु राष्ट्र की सेना और सरकार के पास होता है,  और इसी बिना पर एक बार फिर तालिबानी क्रूरता का काला साया भारत समेत एशिया के एक बड़े हिस्से पर फैलता नजर आता है। तालिबानियों की कट्टरता और पाशविकता के असंख्य प्रमाण हैं। तालिबानी क्रूरता के शिकार बने भारतीय पत्रकार दानिश सिद्दीकी की चीखें अभी भी आसपास गूँज रही हैं,  लेकिन दुर्भाग्य पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तालिबानियों को आम नागरिक कहते नहीं थकते। भारत के लिए स्थाई खतरा चीन के साथ तालिबान के राजनयिक रिश्ते हैं।

एक तरफ तालिबान अपने यहां कलाकारों और लोकतंत्र की बात करने वालों का कत्लेआम कर रहा है वहीं दूसरी तरफ तालिबानी नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर की अगुवाई में तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल बुधवार को अचानक चीन के दौरे पर जा पहुंचा और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ वार्ता की। बातचीत के दौरान तालिबान ने बीजिंग को भरोसेमंद दोस्त बताया और आश्वस्त किया कि समूह अफगानिस्तान के क्षेत्र का इस्तेमाल किसी को भी करने की इजाजत नहीं देगा।

भारत के साथ तालिबान के रिश्ते शुरू से नरम-गरम रहे हैं। अफगानिस्तान में अतीत में भारत का अच्छा खासा निवेश रहा है,  लेकिन ताजा दौर में भारत ने चुप्पी साध रखी है। तालिबान का कहना है कि वह भारत के साथ सकारात्मक संबंध बनाने का इच्छुक है और अफगानिस्तान नई दिल्ली के सहयोग का स्वागत करता है। लेकिन भारत क्या चाहता है ये न देश की संसद को पता है और न दुनिया को। आने वाले दिनों में तालिबान की क्रूरता किस-किस की जान लेगी कहना कठिन है। फिलहाल दुनिया तेल देख रही है और तेल की धार। (मध्‍यमत)
डिस्‍क्‍लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं।
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