कालेधन की मलाई कौन छोड़ना चाहेगा?

प्रमोद कुमार शर्मा

सरकार द्वारा हाल ही में कालेधन की स्वैच्छिक घोषणा की योजना लाई गई है। इससे 45 प्रतिशत कर की राशि अदा कर धन का रंग काले से सफेद किया जा सकेगा। यह सच है कि देश में कालेधन का जंजाल और दुष्चक्र अभेद्य एवं नियंत्रणविहीन है, परंतु विमर्श का विषय बड़ी ही चतुराई से बीमारी उपजने के कारणों से ज्यादा केवल बीमारी पर ही सीमित रखा गया है। संभव है इसमें ‘स्टेक होल्डर्स’ का निहित स्वार्थ हो।

आजाद भारत की इस सनातन एवं शाश्वत समस्या का उद्गम सिर्फ तीन कारणों के चलते हैं-

1- कर चोरी 2- अपराध 3- भ्रष्टाचार

इन सभी कारणों को एक शब्द ‘अपराध’ से भी संबोधित किया जा सकता है। और इसका परिणाम है शोषण अन्याय और अत्या‍चार।

कालेधन से भी ज्यादा चिंताजनक समस्या यह है कि आखिर कालेधन का उद्गम होता ही क्यों है? जवाब भी उतना ही कटु है, कि हमारी चुनी हुई सरकारों द्वारा उनका मुख्य दायित्व ‘गवर्नेंस’ न कर पाने की कोख से ही कालाधन पैदा हुआ है। और आगे भी होता रहेगा।

आखिर सरकारें क्यों अपराध रोकने, भ्रष्टाचार समाप्त करने और टैक्स की चोरी रोकने में विफल रही है? आप मान सकते हैं कि यदि यह सब कर दिया जाए तो जनसेवा के लाभदायी व्यवसाय में मलाई के स्थान पर सड़ी और खराब छाछ ही बचेगी। तंत्र में रहकर भला कौन छाछ पीकर गुजर बसर करना चाहेगा। उससे तो सारा ग्लैमर ही खत्म हो जाएगा।

यह सोचना भी गलत नहीं है कि सरकार कालाधन समाप्त ही नहीं करना चाहती। सत्ता प्रतिष्‍ठान का कालेधन से अटूट रिश्ता‍ है, जिस पर हमारे पांच साला वोट की चोट से भी खरोंच तक नहीं आती। आखिर तंत्र ही तो कालेधन की पैदाइश, परवरिश और हिफाजत कर रहा है। यह सब सोचकर गहरी निराशा और अवसाद होना स्वाभाविक है, परंतु आशा ही छोड़ देना भी कौनसी समझदारी है। देश चुनाव दर चुनाव इसी ऊहापोह या मायामोह के जंजाल में फंसा हुआ है।

यह ध्रुव सत्य है कि कालेधन की अर्थव्यवस्था का आकार जितना बड़ा होगा, ठीक उसी अनुपात में सरकार नामक संस्था  की धमक, चमक और इकबाल भी कम होता जाएगा। मगर इसकी चिंता ही किसे है? डाल पर बैठे लोग ही डाल को काट रहे हैं। बिना गर्त में जाने की चिंता के। ऐसे में सिर्फ भगवान ही याद आते हैं।

आजादी के बाद हम भारत के लोगों ने मिलकर एक सामाजिक अनुबंध किया था। जिसे भारत के संविधान के नाम से जाना जाता है। यदि उस एग्रीमेंट को पूर्णत: लागू नहीं किया गया तो सारे देश का ही बेड़ा गर्क होने से कोई नहीं बचा सकता। इसे अंग्रेजी में रूल ऑफ लॉ कहते हैं।

यह तय है कि समस्या़ की स्‍थायी रोकथाम किए बिना समस्या का इलाज भर कर देने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। जब तक देश में कानून का राज या रूल ऑफ लॉ नहीं होगा, कुछ भी अच्छे की उम्मीद शेखचिल्ली का हसीन ख्वाब ही बना रहेगा। क्या किसी भी बीमारी का इलाज किश्तों में हुआ है? यदि नहीं तो सुधार की प्रक्रिया गंगा के गोमुख से प्रारंभ होकर गंगासागर तक पहुंचनी चाहिए। दुष्यंत कुमार ने ठीक फरमाया है-

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीक ए जुर्म हैं

आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार

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लेखक वरिष्‍ठ चार्टर्ड अकाउण्‍टेंट एवं आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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