राकेश अचल

पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के समर्थक और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर सचमुच जनसेवा के लिए राजनीति में काम कर रहे हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि उन्हें जो काम सौंपा गया है वो पूरे प्रदेश में ऊर्जा व्यवस्था को सुधारने का है, जबकि मंत्री जी अपने विधानसभा क्षेत्र के शौचालयों की सफाई करने में लगे हैं। मंत्री जी के सेवाभाव का विरोध करने का मेरा कोई इरादा नहीं है, किन्तु इसे मैं ठीक वैसा ही मानता हूँ जैसा कि ‘तेली का काम तमोली’ से कराया जाये।

ऊर्जा मंत्री की ऊर्जा को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन उनके कृत्य से कुछ सवाल खड़े होते हैं जो अनुत्तरित हैं। सवाल ये है कि क्या शहर में नगर निगम नाम की कोई संस्था अपना काम नहीं कर रही है, या क्षेत्र का पार्षद अपने घर बैठा हुआ है या सफाई कर्मचारी हड़ताल पर हैं?  कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो गड़बड़ है, क्योंकि एक तरफ मंत्री जी शौचालय साफ़ कर रहे हैं दूसरी तरफ पूर्व महापौर और वर्तमान सांसद की 30 चिट्ठियों का निगम आयुक्त ने कोई उत्तर नहीं दिया है।

अपने इलाके के मंत्री को शौचालय की सफाई करते देख मुझे एक तरफ गर्व होता है तो दूसरी तरफ लज्जा आती है। शहर में नगर निगम के पास सफाईकर्मियों की एक लम्बी फ़ौज के होते हुए यदि किसी मंत्री को शौचालय साफ़ करना पड़ें तो लानत है सरकार के सुशासन पर! ऐसी दशा में सरकार को फौरन नगर निगम प्रशासन के खिलाफ सख्त कार्रावाई करना चाहिए और यदि ये हकीकत नहीं है और मंत्री जी केवल सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए शौचालय साफ़ करते दिखाई दे रहे हैं तो मुख्यमंत्री जी को उन्हें रोकना चाहिए। क्योंकि ऊर्जा मंत्री के दीगर कार्यों में व्यस्त रहने के कारण प्रदेश में विद्युत आपूर्ति का प्रबंधन बुरी तरह से लड़खड़ा रहा है।

प्रद्युम्न सिंह तोमर को ऊर्जा जैसा महत्वपूर्ण विभाग ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अड़कर दिलाया है किन्तु दुर्भाग्य है कि श्री सिंह ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। प्रदेश में विद्युत कटौती और बिलों में गड़बड़ी की शिकायतें दूर करने की कोई कार्ययोजना बनाने के बजाय वे शौचालयों की सफाई में उलझ गए। शौचालयों की सफाई कोई बुरा काम नहीं है, लेकिन एक ऊर्जावान मंत्री के होते प्रदेश की जनता बिजली को लेकर परेशान रहे, ये भी कोई अच्छी बात नहीं है। यदि तोमर ऊर्जा विभाग में अपेक्षित परिणाम न दे सके तो इससे सिंधिया की हेठी होगी।

आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि प्रदेश में कमलनाथ सरकार का तख्ता पलट होने के बाद शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने कोरोना संक्रमण के संकट से जूझ रहे उपभोक्ताओं को बिलों में राहत देने की बात कही थी। 2 जून को ऊर्जा विभाग इसका आदेश भी निकाल चुका है। वहीं इसके उलट बिजली कंपनी हजारों रुपये के बिल थमा रही है। ये आरोप प्रदेश के बिजली उपभोक्ता लगा रहे हैं। हालांकि इसकी काट में बिजली कंपनी ने इंदौर में 24 जून से बिल सुधार शिविर लगाए हैं। अभी तक कितने उपभोक्ताओं के बिलों में कितनी राशि का सुधार किया है। इसकी जानकारी उपभोक्ताओं को नहीं दी जा रही है। मंत्री जी ने इस दिशा में ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

ऊर्जा मंत्री की ऊर्जा यदि संबल योजना के हितग्राहियों के हित में खर्च होती तो और बात थी। खबर है कि अप्रैल में जब लॉकडाउन था उस वक्त मीटर रीडिंग नहीं हुई। बिजली कंपनी ने अप्रैल 2019 को आधार मानकर अप्रैल 2020 के बिल जारी किये। अब छूट का आधार भी इसे ही बनाया जा रहा है, जबकि पहले ही उपभोक्ता बिजली बिल ज्यादा आने से परेशान हैं। कंपनी भी मान रही है कि सॉफ्टवेयर में भी 2019 में हुई खपत के मुताबिक जारी बिल पर ही छूट तय की जाएगी। ऐसे में कम ही लोगों को मुख्यमंत्री की बिल में छूट योजना का लाभ मिल पाएगा। क्या ऊर्जा मंत्री शौचालयों की सफाई छोड़कर इस और ध्यान दे पाएंगे?

इस समय मंत्रिमंडल में बिना विधानसभा के सदस्य होते हुए भी मंत्री बने जन प्रतिनिधि अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में जनता को रिझाने में जुटे हैं ताकि उन्हें दल-बदल के अपराध से क्षमा मिल सके और वे उपचुनाव में दोबारा जीतकर विधानसभा पहुँच सकें। ऊर्जा मंत्री की समाजसेवा भी इसी कर्म में है। वे अपना जनसेवा अभियान जारी रखें लेकिन साथ ही यदि विभाग का कामकाज भी देखते रहें तो बात और बन सकती है। खबर है कि ऊर्जा विभाग में काम करने वाली तमाम कंपनियों के प्रतिनिधियों को अब मंत्री जी से बात करने बार-बार ग्वालियर आना पड़ रहा है फिर भी बात नहीं बन रही है। हकीकत क्या है राम ही जाने!

प्रदेश की कोरोना ग्रस्त सरकार में सभी मंत्रियों को जनसेवा के साथ-साथ अपना मूल काम भी करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल की वर्चुअल बैठक में इस विषय में कोई निर्देश दिए हैं या नहीं, पता नहीं। ऊर्जा मंत्री जिस तरीके से काम कर रहे हैं उसे जनता भले ही सही माने, किन्तु प्रशासन की दृष्टि से इसे ठीक नहीं कहा जा सकता।