गिरीश उपाध्‍याय

कोई निश्चित आंकड़ा भले ही तत्‍काल उपलब्‍ध न हो पाए लेकिन जो लोग भारतीय टीवी दर्शकों की मानसिकता को जानते हैं वे इस बात को बिना हिचक स्‍वीकार करेंगे कि रविवार को दोपहर डेढ़ बजे से ढाई बजे के बीच न्‍यूज टीवी चैनल दर्शकों की संख्‍या सर्वाधिक रही होगी। जी हां, यह वो समय था जब नोएडा के चर्चित ट्विन टॉवर गिराए गए।

ट्विन टॉवर के अवैध निर्माण, उनकी लागत, उनकी ऊंचाई, निर्माण की पूरी प्रक्रिया में हुए भ्रष्‍टाचार के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है और ये दोनों भवन गिराए जाने के बाद भी इन विषयों के अलावा विस्‍फोट के कारण हुए पर्यावरण प्रदूषण व लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर असर को लेकर आने वाले कई दिनों तक बात होती रहेगी। लेकिन मेरे हिसाब से ट्विन टॉवर की घटना को सिर्फ अतिक्रमण हटाने या गैर कानूनी निर्माण आदि के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इस बात पर भी विचार होना चाहिए कि आखिर हमारे समाज की रुचि सृजन के बजाय विध्‍वंस की घटनाओं में ज्‍यादा क्‍यों होती है।

ट्विन टॉवर जैसी घटनाओं से मीडिया और खबरों के प्रति लोगों के रुझान की मानसिकता का भी पता चलता है। दरअसल हमने समाज को इस तरह गढ़ा है जिसमें सृजन पर कम बल्कि उसके विध्‍वंस पर ध्‍यान ज्‍यादा जाता है। या यूं कहें कि इन दिनों सृजन नहीं विध्‍वंस ज्‍यादा बिकता है। ये ट्विन टॉवर एक दिन में तो नहीं ही बने होंगे। ऐसा भी नहीं है कि उनके निर्माण में होने वाली कानून कायदों की अवहेलना और भ्रष्‍टाचार से कोई भी वाकिफ नहीं होगा। पर चूंकि हम धीरे धीरे होती जाती घटनाओं की अनदेखी करने या उन्‍हें सहज रूप से स्‍वीकार करने की मनोवृत्ति के आदी हो गए हैं इसलिए हम उस पर ध्‍यान नहीं देते। ट्विन टॉवर जैसी घटनाओं के पीछे के गैरकानूनी कामों या भ्रष्‍टाचार पर हमारा ध्‍यान तब जाता है जब उन्‍हें ध्‍वस्‍त करने की बात होती है।

क्‍या सचमुच हम इस विध्‍वंस के दौरान, उसके पीछे के कारणों के बारे में भी सोच रहे हैं? शायद नहीं… दुर्भाग्‍य से हम ऐसी घटनाओं को ‍मनोरंजक घटना के रूप में लेते हुए उससे रोमांचित होते हैं। यानी भ्रष्‍टाचार का होना या होते रहना हमारे लिए सोच अथवा कुछ करने का विषय नहीं है, पर उसके परिणामों पर होनी वाली कार्रवाई के नाटकीय या मनोरंजक तत्‍व में हमारी रुचि भरपूर होती है।

एक और बात देखिये… इस विध्‍वंस को दिखाने के लिए हमारे टीवी चैनलों ने भारी तैयारी की थी। चार-पांच दिन पहले से ही इस घटना को इस तरह प्रचारित किया जा रहा था मानो भारत का भाग्‍य पलटने वाला है। विस्फोट की तैयारियों को ऐसे दिखाया जा रहा था मानो कोई महान घटना हो रही हो। विस्‍फोट के दिन हर चैनल इसके कवरेज को लेकर खुद को दूसरों से अव्‍वल बताने की होड़ में दिखा। किसी ने कवरेज के लिए चार कैमरे लगाए थे तो किसी ने आठ, किसी ने 16 लगाए थे तो किसी ने 60। मुझे याद नहीं पड़ता कि देश में किसी बड़े सार्वजनिक निर्माण को बताने के लिए कभी इस तरह की तैयारी की गई हो या उस पर इतना समय, धन और मानवश्रम खर्च किया गया हो।

शोध करने वालों के लिए यह अच्‍छा विषय हो सकता है कि वे इस बात का पता लगाएं कि ट्विन टॉवर ध्‍वस्‍त होते समय टीवी चैनलों की दर्शक संख्‍या क्‍या रही और जब फरवरी 2017 में भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्‍था इसरो ने अपने रॉकेट से एकसाथ 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने का कीर्तिमान रचा था उस समय की दर्शक संख्‍या क्‍या थी। दोनों घटनाओं में दर्शक संख्‍या के अलावा घटना के मीडिया कवरेज की तैयारियों और उनके लिए जुटाए या मुहैया कराए गए संसाधनों का भी तुलनात्‍मक अध्‍ययन किया जा सकता है।

विध्‍वंस में यह रुचि  एक तरह से वैश्विक मनोवृत्ति है। मुझे याद है बरसों पहले 90 के दशक में प्रसारण की नई तकनीक और सेटेलाइट ट्रांसमिशन की सुविधा के चलते अमेरिकी चैनलों ने खाड़ी युद्ध का सीधा प्रसारण किया था। यह विडंबना ही थी कि उस प्रसारण को पूरी दुनिया ने युद्ध की विभीषिका और उसके कारण होने वाले नरसंहार व तबाही के दृष्टिकोण से देखने के बजाय एक मनोरंजक घटना के रूप में अधिक देखा। युद्ध के दौरान सैनिकों और मानव बस्तियों पर की जाने वाली बमबारी और मिसाइल अटैक को रोचक आतिशबाजी की तरह लिया गया।

ज्‍यादा दूर क्‍यों जाएं… हाल ही में रूस युक्रेन युद्ध में भी तो यही हुआ। वहां भी रूसी सेनाओं द्वारा की जाने वाली गोलाबारी और हवाई हमलों को रोमांचक घटना के रूप में देखा गया। विध्‍वंस को देखने में लोगों की रुचि कितनी अधिक होती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय मीडिया चैनलों में अपने संवाददाताओं को यूक्रेन भेजने की होड़ सी लगी हुई थी। उनमें एक प्रतिस्‍पर्धा सी चल रही थी कि युद्ध और तबाही के दृश्‍य कौन अधिक से अधिक दिखा सकता है। इस युद्ध में परमाणु बम के उपयोग के कयासों को लेकर कही जाने वाली बातों और कवरेज से कई बार तो ऐसा महसूस होता था मानो चैनलों को इस बात का मलाल है कि परमाणु बम का उपयोग आखिर हो क्‍यों नहीं रहा है।

विध्‍वंस को लेकर भी लोग रोमांचित या हर्षित हो सकते हैं इसका पहला अनुभव मुझे पिछली शताब्‍दी के अंत में उस समय इंदौर में हुआ था जब जिला प्रशासन ने वहां एक 6 मंजिला अवैध इमारत को विस्‍फोटकों से उड़ा दिया था। मैंने उस घटना का कवरेज किया था। प्रशासन की मनाही के बावजूद लोग उस बिल्डिंग के आसपास, एक तरह से उसे घेरकर खड़े थे, यह देखने के लिए आखिर विस्‍फोट से भवन गिरता कैसे है। विस्‍फोट के समय 100 मीटर दूर खड़ा होने के बावजूद एक पत्‍थर मेरे हाथ पर आकर लगा था। लेकिन जैसे ही भवन गिरा लोगों ने जोर से हर्षध्‍वनि करते हुए तालियां बजाईं।

सवाल यह है कि हम ऐसी घटनाओं को दूसरे नजरिये देखना, उनसे सबक लेना और इन घटनाओं का कारण बनने वाली परिस्थितयों को रोकना कब सीखेंगे। ऐसा तो होता ही नहीं है कि ये भवन एक दिन में बन जाते हैं। इन्‍हें बनने में बरसों बरस लगते हैं लेकिन हमारा ध्‍यान उस ओर कभी नहीं जाता। हम भ्रष्‍टाचार हो चुकने के बाद उस पर छाती पीटने को मानो अभिशप्‍त हैं।

मुझे इस संबंध में अपने ही साथ घटी एक और घटना याद आती है। भोपाल में एक अखबार का संपादक रहते हुए हमने शहर की एक सड़क के बार-बार होने वाले निर्माण और उस पर हो रहे करोड़ों रुपये के खर्च का मामला उठाया। इसी संदर्भ में हमने अपने पाठकों से अपील की कि अब आपके इलाके में जब भी कोई सड़क बने, आप उस पर निगाह रखें कि वह ठीक से बन रही है या नहीं। उसमें इस्‍तेमाल होने वाली सामग्री गुणवत्‍तापूर्ण है या नहीं। हमने प्रस्‍ताव दिया था कि आप हमें जानकारी दें, हम उसे फोटो सहित प्रकाशित कर, संबंधित विभाग या प्रशासन पर दबाव बनाते हुए यह सुनिश्चित करवाने की कोशिश करेंगे कि निर्माण ठीक हो। लेकिन आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि पाठकों का कोई रिस्‍पांस नहीं आया।

ट्विन टॉवर के मामले में भी मुझे यही लगता है। काश, लोगों ने (और मीडिया ने भी) जितनी रुचि उन्‍हें गिराए जाने की घटना को देखने में प्रदर्शित की है, उतनी रुचि वे उसके निर्माण के समय और मंजिल दर मंजिल बढ़ती उसकी उंचाई के समय भी दिखाते और जनदबाव बनाते तो इस भ्रष्‍टाचार को समय रहते रोकने में मदद मिलती। ऐसी घटनाएं जब भी होती हैं वे भ्रष्‍टाचार को लेकर एक संदेश जरूर दे जाती हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि ऐसे तमाम निर्माणों में इस देश का, इस देश के करदाताओं का पैसा लगा है, देश के संसाधन लगे हैं। इस तरह उनका नष्‍ट हो जाना क्‍या उचित कहा जा सकता है?

ट्विन टॉवर की घटना का कवरेज किए जाते समय एक चैनल के एंकर ने बहुत रोचक बात कही। उसने कहा ‘’जिस रास्‍ते पर ये भवन बने हैं कल रात मैं उसी रास्‍ते से गुजरा तो वहां मेले जैसा माहौल था। लोगों में ट्विन टॉवर के साथ सेल्‍फी लेने की होड़ थी।‘’ रविवार को जब ये टॉवर गिराए गए तब भी माहौल कुछ अलग नहीं था। भवन के आसपास मौजूद रहने की मनाही के बावजूद लोग भारी संख्‍या में सड़कों पर और अपने मकानों की छतों पर मौजूद थे, कोई सेल्‍फी ले रहा था, तो कोई गिरते हुए भवनों को अपने मोबाइल में कैप्‍चर करने को बेताब था।

दुर्भाग्‍य यह है कि ट्विन टॉवर का गिराया जाना सेल्‍फी के रूप में याद रहेगा या कि सहेज कर रखा जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे हम बरसों बरस भ्रष्‍टाचार को बुलंदियों पर चढ़ाते और पाल पोसकर रखते आए हैं। पर बड़ा सवाल ये है कि हम कब भ्रष्‍टाचार को इस तरह बुलंदियों की मंजिले तय करते समय ही रोकने का जतन करेंगे… या कि हमने ठान लिया है कि हमारा काम सिर्फ भ्रष्‍टाचार को लेकर कार्रवाई के नाम पर किए जाने वाले तमाशे की सेल्‍फी लेना ही है। ट्विन टॉवर गिराये जाने के बाद विशेषज्ञों ने कहा कि उसमें किया गया विस्‍फोट कंट्रोल्‍ड था, अब यह बात कौन तय करेगा कि भ्रष्‍टाचार भी तो कभी कंट्रोल हो…
(न्‍यूज 18 में प्रकाशित)