अनिल त्रिवेदी

सब लोग एक समान आर्थिक परिस्थिति के नहीं होते हैं।  आज की हमारी दुनिया में अति सम्पन्न से लेकर,  अति विपन्न आर्थिक परिस्थिति के लोग,  अपना अपना जीवन अपने हिसाब से जी रहे हैं। भारत में लोकतंत्र और लिखित संविधान हैं। लोकतंत्र में लोगों को गरिमामय तरीके से जीवन जीने का अधिकार हैं पर यह अधिकार कोई दिखावटी गहना नहीं हैं। यह अधिकार लोगों की जिन्दगी में जीवन्त रूप से दिखाई भी देना चाहिये। लोकतंत्र में लोगों के जीवन जीने के अधिकार की प्राणप्रण से सुरक्षा करना यह राज्य के सबसे अंतिम श्रेणी से लेकर सर्वोच्च श्रेणी के कर्मचारी, अधिकारी और चुने हुए जनप्रतिनिधियों तक का प्राथमिक दायित्व और मूलभूत कर्तव्य हैं।

कोरोना काल की विशेष परिस्थिति हो या लॉकडाउन जैसा जीवन सुरक्षा का आपातकालीन उपाय हो, इसमें राज्य और आम जनता, दोनों से ही अतिरिक्त सावधानी की अपेक्षा होती हैं। पर राज्य या समाज दोनों को सामान्य काल हो या आपातकाल, मनमानी, लापरवाही या भेदभाव करने का हक नहीं हैं। भारत के संविधान में यह भी स्पष्टता है कि सारे प्रावधान और कानून लोक सुरक्षा, व्यवस्था और लोक कल्याण के लिये हैं। यह सब होते हुए भी आज के भारत और हमारे शहरों में,  सभी लोगों के पास हर परिस्थिति में, अनिश्चितकाल तक बिना कोई रोजगार या काम धंधा किये, खुद की और परिवार की दोनों समय की रोटी और जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करना संभव नहीं है।

यह भी आज के जीवन की सच्चाई है। आप यदि बड़े शहर या गांव में रहते हैं तो आपके दैनिक जीवन में खाने कमाने की एक निरन्तर प्रभावी कड़ी या चेन का आपके पास बना रहना जरूरी है। पिछले चार माह से भारत शासन और इन्दौर जिला प्रशासन ने जो जो उपाय सुझाये या लागू किये उन्‍हें भारत के अधिकांश और हमारे इन्दौर के हर हैसियत और आयु के नागरिकों ने आजीविका और भोजन का संकट होने पर भी किसी तरह निभाया हैं और आगे भी निभायेगें। पर इसका यह अर्थ नहीं हैं कि शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधि और सभी क्षेत्रों के अग्रणी लोग और नागरिकगण इस सवाल को अनदेखा करें। लोगों को प्रतिदिन निरन्तर रोजी रोटी मिले यह भी महामारी से सुरक्षा जैसा ही हम सबकी पहली प्राथमिकता का लोकदायित्व है। पर इसे प्राणप्रण से पूरा करने का काम शासन प्रशासन का पहला है, नागरिक तो इसमें प्रतिबन्धों के अधीन मददगार होंगे ही।

एक महत्व की बात यह है कि देश में खाने की आवशयक वस्तुओं का कोई अभाव नहीं हैं। अभाव है करोना काल में निर्बाध रूप से हर व्यक्ति तक जीवनावश्यक भोजन सामग्री की वितरण व्यवस्था का। लॉकडाऊन खोला ही इसलिये गया कि लोग रोजगार कर सकें और जीवनावश्यक वस्तुएं खरीद सकें। हमारे शहरों में बाजार की कार्यप्रणाली कैसी है क्या यह हम सबको पता नहीं हैं? दुकान खुलेगी और लोग सामान खरीदने जायेंगे। किसी समय ज्यादा लोग जायेंगे, कभी कम जायेंगे, यह सामान्य काल की बात हैं। कोरोनाकाल में एक साथ कम समय में ज्यादा लोग खरीदी करने न पहुंचें इसकी कोई कार्ययोजना हमारे पास हैं ही नहीं, हम खोजेंगे भी नहीं और हम बनायेंगे ही नहीं तो भीड़ तो होगी ही।

कोरोना काल में हुए सर्वे से यह तथ्य उजागर हुआ कि हमारे इन्दौर शहर की आबादी चालीस लाख है। तो इसका अर्थ यह है कि हमारे शहर का शासन-प्रशासन व जनप्रतिनिधि प्रतिदिन चालीस लाख लोगों की जीवनावश्यक जरूरतों को शहर के बाजारों में बिना भीड़, भगदड़ और सुरक्षित दूरी के साथ कैसे पूरी कर सकते हैं, इस चुनौती को स्वीकार करें और कार्ययोजना बनायें। इन्दौर सरकारी शहर नहीं है, असरकारी शहर है। इसे मनमाने दण्डत्माक उपायों और प्रतिबन्धात्मक आदेशों से नहीं चलाया जा सकता। बाजार और नागरिक दोनों ही शासन प्रशासन से न तो अबोला रखें और न ही भयभीत हों।

सबको एक दूसरे को समझना चाहिये और जो जो कमियां  हमने पिछले चार माह में शासन प्रशासन और नागरिक व्यवहार में महसूस की हैं उन्‍हें सभी खुले मन से दूर करें बजाय आलोचना, प्रत्यालोचना में उलझने के। सारे अधिकारी कर्मचारी, जनप्रतिनिधि सभी क्षेत्रों के आगेवान लोग तथा आम नागरिक हम सब न तो एक जैसी सोच वाले हैं और न ही एक जैसी समझ और स्वभाव वाले हैं। फिर भी हम सब एक मामले में एक-समान हैं, वह यह कि हम सब की चुनौती  एक ही है। हम सबको कोरोना काल की चुनौती का मुकाबला मिल जुलकर ही करना है। इसका कोई विकल्प नहीं हैं। यह बात हम सबको समझनी है।

एक बात हमको यह तय करनी होगी कि हम कोरोना काल में एक दूसरे की हर तरह से मदद करेंगे। विशेष रूप से उन नागरिकों की जो रोज काम करने के बाद ही या कमाने के बाद ही, घर के भोजन की व्यवस्था कर पाते हैं। इन्दौर उत्पादन का नहीं, खरीदो बेचो का शहर है। इस कारण शासन प्रशासन और लोगों में लोभ-लालच की वृत्ति का प्रतिशत यहां ज्यादा है। इस समय चाहे हम कोई भी हों, हमें लोभ लालचवश ज्यादा कमाई करने का काल नहीं मानना चाहिये। हमारे पास अपने आप पर नियंत्रण करने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं है।

कोरोना काल में लोभ-लालच, लूट-खसोट, पद का दुरुपयोग और दुखी दर्दी, बीमार, भूखे, रोजगारविहीन लोगों के साथ व्यवस्था के नाम पर अराजकता जैसे दृश्य खड़े करना न तो राज की सभ्यता हो सकती है न सामाजिक, राजनैतिक और व्यावसायिक समाज की। कोरोना काल में लोगों को सस्ती सुलभ और सुरक्षित वितरण व्यवस्था कैसे उपलब्ध करायें इसके नये तरीके खोजना सबसे जरूरी काम है। निहत्थे नागरिकों को किसी भी व्यवस्थागत कारण से परेशान करना उनकी आजीविका के साधनों को नष्ट करना, सभ्य और लोककल्याणकारी तरीका नहीं है।

रोटी और रोजी की ताकत से ही घर,  समाज और व्यवस्था ठीक से चलती है। इसलिए यहां शासन प्रशासन के कर्ताधर्ताओं की जवाबदारी सबसे ज्यादा है। होना यह चाहिये की लोगों के लिये रोजी रोटी पाने के अवसर को कोरोना की लड़ाई में प्राथमिक जरूरत समझा जावे। जैसे इस काल में राज्य ने स्वयं अपनी आमदनी के स्रोतों पेट्रोल डीजल के भाव और शराब की दुकानों पर शराब विक्रय को राजकीय आय  बढ़ाने की दृष्टि से प्रारम्भ किया है, तो यही दृष्टि नागरिकों की रोजी रोटी की जरूरत के बारे में भी स्वीकार करना चाहिये।

कोरोना की वैक्‍सीन की खोज जारी है। शायद जल्दी सफलता मिले। पर रोजी रोटी के अवसरों की खोज नहीं होनी है, वे राज और समाज के पास हैं। आज जरूरत इस बात की है कि हम इस मामले में महामारी से बचने के सुरक्षा उपायों की तरह रोजी रोटी की निरन्तर उपलब्धता को कहीं भी कमजोर और लुप्त न होने दें। कोरोना काल हम सबके धीरज की परीक्षा का काल है। इसमें हम चाहे राज हों या समाज, सबको धीरज के साथ ही संविधान में प्रदत्त गरिमामय जीवन को जिंदादिली से जीना है।

(लेखक वरिष्‍ठ अभिभाषक हैं)