अजय बोकिल
एक समय था जब ‘हड़ताल’ शब्द सत्ता और व्यवस्था दोनों को विचलित कर देता था। सरकारी, अर्धसरकारी दफ्तरों से लेकर कपड़ा मिलों तक श्रमिक संगठनों की आवाज गूंजती थी। समाजवादी नीतियों में हड़ताल को श्रमिक का अधिकार माना जाता था और उसका उपयोग भी उसी आत्मविश्वास के साथ होता था। यहां तक कहा जाने लगा था कि सरकारी दफ्तरों में काम कम और हड़ताल ज्यादा होती है।
लेकिन नई आर्थिक नीतियों के दौर में हड़ताल भी धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई। बाजार की भाषा ने श्रम की भाषा को पीछे धकेल दिया। ऐसे में बीते साल के अंतिम दिनों में देशभर में हुई गिग वर्करों की दो दिवसीय हड़ताल ने सबका ध्यान खींचा। यह हड़ताल इसलिए भी महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसमें वे लोग शामिल थे जिन्हें हम रोज देखते हैं, पहचानते हैं, लेकिन जिनकी जिंदगी को समझने की कोशिश नहीं करते।
ये वही लोग हैं जिनके बिना आज का शहरी जीवन ठप पड़ सकता है - डिलीवरी बॉय और कैब ड्राइवर। ऐप आधारित क्विक कॉमर्स और ट्रैवल प्लेटफॉर्म ने इन्हें ‘डिलीवरी पार्टनर’ या ‘राइड पार्टनर’ का सम्मानजनक नाम तो दे दिया है, लेकिन हकीकत में इनकी स्थिति न नियमित कर्मचारी जैसी है और न ही दिहाड़ी मजदूर जैसी। ये श्रम की उस ग्रे जोन में खड़े हैं, जहां अधिकार नहीं, सिर्फ जिम्मेदारियां हैं।
दो दशक पहले तक गिग वर्कर शब्द लगभग अज्ञात था। लेकिन जैसे ही इंटरनेट और स्मार्टफोन ने अर्थव्यवस्था का चेहरा बदला, वैसे ही लाखों युवाओं को रोजगार की मजबूरी में ऐप आधारित काम की ओर धकेल दिया गया। काम की शर्त साफ है ऑर्डर आएगा, तो आप दौड़ेंगे। कब, कहां और कितनी देर काम करना है, इसका फैसला एल्गोरिदम करेगा। यही कारण है कि इन्हें ‘डिजिटल बंजारा’ भी कहा जाने लगा है।
हाल में बेहतर कार्य परिस्थितियों और अधिक पारिश्रमिक की मांग को लेकर इन गिग वर्करों ने दो दिन की हड़ताल की। दावा किया गया कि इससे फूड डिलीवरी सिस्टम ठप हो जाएगा। लगभग 70 हजार वर्करों के शामिल होने की बात कही गई। हालांकि कंपनियों ने इसे विफल बताया, लेकिन इस हड़ताल ने एक सच्चाई को सतह पर ला दिया। गिग वर्कर्स ने सिस्टम को बता दिया है कि वे अब चुप नहीं रहने वाले।
समस्या की जड़ यही है कि कंपनियां इन्हें ‘पार्टनर’ बताकर श्रम कानूनों से बचती हैं। शिकायत होते ही आईडी ब्लॉक कर देना, समय पर डिलीवरी के दबाव में जान जोखिम में डालना और हर गलती का आर्थिक बोझ वर्कर पर डाल देना, यह सब साझेदारी नहीं, शोषण की आधुनिक शक्ल है। ग्राहक के लिए दिन-रात का कोई फर्क नहीं, क्योंकि उसने भुगतान किया है। लेकिन उस भुगतान की कीमत गिग वर्कर अपने स्वास्थ्य, समय और सुरक्षा से चुकाता है।
कागजों में गिग वर्क फ्रीलांस और लचीला रोजगार है। जितना काम, उतना भुगतान। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह फुल टाइम नौकरी से भी ज्यादा थकाने वाला काम है, जिसमें न तय समय है, न छुट्टी और न सामाजिक सुरक्षा। इसी शोषण के खिलाफ तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन और इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स ने हड़ताल का आह्वान किया। कंपनियों ने इसे तोड़ने के लिए इंसेंटिव का सहारा लिया, लेकिन सवाल खत्म नहीं हुआ। गुस्सा केवल कंपनियों से नहीं, सरकार की भूमिका को लेकर भी है।
हालिया हड़ताल का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि केंद्र सरकार को हरकत में आना पड़ा। सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत गिग वर्करों के लिए नया ड्राफ्ट सामने आया है। पहली बार गिग वर्कर को श्रमिक की श्रेणी में लाने की बात हुई है। प्रस्ताव है कि इनके लिए अलग सामाजिक सुरक्षा कोष बने, कंपनियां योगदान दें और काम के दिनों को परिभाषित किया जाए।यह स्वागतयोग्य पहल है, लेकिन इसे अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। न्यूनतम वेतन, काम के घंटे, दुर्घटना बीमा, महिला वर्करों के लिए बुनियादी सुविधाएं ये सवाल अभी भी अधूरे हैं।
नीति आयोग के अनुसार 2022 में देश में 77 लाख गिग वर्कर थे और 2030 तक यह संख्या 2.5 करोड़ तक पहुंच सकती है। इनमें करीब 30 प्रतिशत महिलाएं हैं, जिनके लिए शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। ‘Prisoners on Wheels’ जैसी रिपोर्टें बताती हैं कि बड़ी संख्या में ड्राइवर 14 घंटे से ज्यादा काम करने को मजबूर हैं और फिर भी दिन की कमाई 500 से 1000 रुपये के बीच सिमट जाती है।
राजस्थान और कर्नाटक ने इस दिशा में कुछ पहल जरूर की है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। अगर समय रहते गिग वर्करों के अधिकार तय नहीं किए गए, तो यह रोजगार क्षेत्र भविष्य में एक बड़ा सामाजिक संकट बन सकता है। डिजिटल अर्थव्यवस्था की चमक के पीछे छिपे इन ‘डिजिटल बंजारों’ को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुविधा की कीमत किसी इंसान की गरिमा से चुकाई जाए, यह स्वीकार्य नहीं हो सकता।
(मूल आलेख के संपादित अंश)