विशेष प्रतिनिधि
भोपाल/ 
भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल (बीएलएफ) एक बार फिर विवादों में है। यूं तो यह आयोजन हर बार किसी न किसी विवाद को लेकर ही सुर्खियों में रहता है, लेकिन इस बार इसका आठवां संस्करण बाबर से संबंधित एक प्रस्तावित सत्र को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गया है। भारत भवन जैसे प्रतिष्ठित शासकीय सांस्कृतिक परिसर में 10 और 11 जनवरी को आयोजित इस फेस्टिवल में बाबर पर केंद्रित एक सत्र प्रस्तावित किया गया था। तीखे विरोध के बाद यह सत्र भले ही स्थगित कर दिया गया हो, लेकिन उससे पैदा हुई विवाद की लहरें अब भी भोपाल के साहित्यिक और राजनीतिक गलियारों में तेज बनी हुई हैं।

यह विवाद केवल एक सत्र या एक किताब तक सीमित नहीं रहा। बात अब सरकारी संसाधनों के उपयोग, सांस्कृतिक संस्थानों की भूमिका और वैचारिक प्राथमिकताओं तक पहुंच चुकी है।

स्वदेश की आपत्ति और सवालों की शुरुआत

विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब राजधानी के राष्ट्रवादी दैनिक ‘स्वदेश’ ने बीएलएफ में प्रस्तावित सत्र-‘बाबर: हिन्दुस्तान की खोज’- को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। अखबार ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसे आयोजनों में किसी न किसी बहाने भारत के आक्रांताओं को विमर्श के केंद्र में रखकर उन्हें जनमानस में बनाए रखने की कोशिश क्यों की जाती है।

इसके साथ ही अखबार ने यह भी सवाल उठाया कि भारत भवन जैसी शासकीय संस्था का उपयोग नियमों के विपरीत एक गैर-सरकारी आयोजन के लिए कैसे किया गया। अखबार ने आयोजन से जुड़ी प्रशासनिक सक्रियता, अधिकारियों को संसाधन जुटाने के निर्देश और सरकारी तंत्र की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। खासतौर पर यह पूछा गया कि मध्यप्रदेश का संस्कृति विभाग इस आयोजन में इतनी रुचि क्यों ले रहा है और इसके लिए आर्थिक व व्यवस्थागत संसाधन कैसे उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

सत्र स्थगित, लेकिन विवाद और तेज

इन सवालों और आपत्तियों के बाद बीएलएफ में बाबर से संबंधित पुस्तक के लेखक आभास मलदहियार की किताब पर केंद्रित चर्चा सत्र स्थगित कर दिया गया। लेकिन सत्र के स्थगन से मामला शांत होने के बजाय और ज्यादा गर्मा गया।

लेखक आभास मलदहियार ने इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह सहित अन्य केंद्रीय नेताओं को टैग करते हुए सोशल मीडिया पर एक खुला पत्र साझा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि अखबार ने उनके विरुद्ध मानहानिकारक और तथ्यहीन रिपोर्ट प्रकाशित की है। लेखक का कहना था कि उनकी किताब को बिना पढ़े ही बाबर समर्थक बताने की कोशिश की गई, जबकि पुस्तक में बाबर के महिमामंडन के बजाय उसकी आलोचनात्मक पड़ताल की गई है।

पीएम को टैग, इसलिए प्रतिक्रिया भी आई

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को टैग किए जाने के बाद इस मामले पर प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक था। 13 जनवरी के अंक में ‘स्वदेश’ ने लेखक को जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि बीएलएफ को लेकर प्रकाशित उसकी किसी भी रिपोर्ट में न तो लेखक का नाम है और न ही उनकी किताब का कोई उल्लेख। अखबार ने यह भी कहा कि किसी भी कथन को लेखक से जोड़कर प्रस्तुत नहीं किया गया।

अखबार का कहना था कि ऐसे में यह आरोप कि लेखक की मंशा या पुस्तक की विषयवस्तु को लेकर झूठा दावा किया गया, तथ्यों के अनुरूप नहीं है।

व्यक्ति नहीं, मंच और एजेंडा पर सवाल

‘स्वदेश’ ने अपने जवाब में यह भी रेखांकित किया कि उसकी आपत्ति किसी लेखक या किताब से नहीं है। अखबार का सरोकार उस आयोजन मॉडल और वैचारिक ढांचे से है, जो बीएलएफ के पिछले संस्करणों में भी दिखाई देता रहा है।

अखबार के अनुसार, पूर्व वर्षों में इस मंच पर एलजीबीटीक्यू विमर्श, कल्चरल जेनोसाइड, इंटेलेक्चुअल टेररिज्म जैसे विषयों पर सत्र आयोजित हो चुके हैं, जिन्हें वह भारतीय समाज के विरुद्ध एक खास नैरेटिव स्थापित करने का प्रयास मानता है। इस बार सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि मध्यप्रदेश सरकार सहित 44 संस्थानों को इस आयोजन से फंडिंग के उद्देश्य से जोड़ा गया।

अखबार ने कहा कि जब इस तरह के विमर्श सरकारी धन, शासकीय भवन और प्रशासनिक सहयोग से आयोजित हों, तो उन पर सवाल उठाना न केवल स्वाभाविक बल्कि जरूरी हो जाता है।

‘विक्टिम कार्ड’ और नैरेटिव गढ़ने का आरोप

अखबार ने यह भी कहा कि स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत कर पूरे विवाद को असहिष्णुता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के फ्रेम में ले जाना मूल मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश जैसा प्रतीत होता है। अखबार के अनुसार, यह मामला न तो किसी किताब को जलाने का है और न ही किसी विचार को प्रतिबंधित करने का।

मूल प्रश्न यह है कि क्या सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है और क्या राज्य की सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को जानबूझकर विवादास्पद दिशा में मोड़ा जा रहा है।

माखनलाल विवि के कुलपति की सख्त टिप्पणी

इस पूरे मामले में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति विजयमनोहर तिवारी की प्रतिक्रिया ने विवाद को और गंभीर बना दिया है। श्री तिवारी भारत भवन न्यास के सदस्य भी हैं। उन्होंने संस्कृति मंत्री को लिखे पत्र में कहा-

🔴 “मुझे लगता है कि जनता से जुड़ाव न होने के कारण ही जानबूझकर ऐसे विषय और सत्र रखे जाते हैं, जिनसे अनावश्यक भ्रम पैदा हो और विवाद खड़े हों। संभव है कि भीड़ जुटाने के लिए आयोजकों की ओर से यह एक सुनियोजित नीति हो। किंतु दुर्भाग्य है कि इस कुत्सित कार्य के लिए भारत भवन को एक अखाड़ा बना दिया गया है और वह भी शासन की नाक के नीचे।”
- विजयमनोहर तिवारी, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद

भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल से जुड़ा यह विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब इसके विषय-चयन और संरचना पर सवाल उठे हों। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बहस साहित्य तक सीमित नहीं रही। वह सरकारी फंडिंग, प्रशासनिक भूमिका और सांस्कृतिक संस्थानों की जवाबदेही तक पहुंच चुकी है।

अब सवाल केवल बाबर का नहीं है। सवाल यह है कि भोपाल जैसे शहर में साहित्य के नाम पर कौन-सा विमर्श, किस संरक्षण में और किस उद्देश्य से स्थापित किया जा रहा है।

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