गिरीश उपाध्याय
अगर आप सोचते हैं कि किसी महिला को ‘आंटी’ कहकर आप उसका सम्मान कर रहे हैं या उसके प्रति आदर दिखा रहे हैं तो जरा संभल जाइये। क्योंंकि यह मामला एकतरफा नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि जिस महिला को ‘आंटी’ कहा जा रहा है उसे खुद के लिए यह संबोधन मंजूर है या नहीं... वह खुद को ‘आंटी’ मानती है या नहीं... अगर वह ऐसा नहीं मानती तो फिर उसे ‘आंटी’ कहने वाला इसके नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहे।
हमारे यहां बहुत पुरानी कहावत है- तोल मोल के बोल। बुजुर्ग कह गए हैं कि जबान को उतना ही खोलो जितना संभाल सको, वरना यह गले का फंदा बनने में देर नहीं करती। दो दिन पहले खबरों की अजब गजब दुनिया में ऐसा ही कुछ देखने/पढने को मिला। एक बड़े राष्ट्रीय अखबार ने दो खबरें एक साथ अपने फ्रंट पेज पर लगाईं। इन दोनों खबरों का वास्ता ऐसे संबोधनों से था जो हम अकसर रोजमर्रा जीवन में यूं ही इस्तेमाल कर लेते हैं।
पहली खबर लंदन से आई थी जिसमें कहा गया था कि वहां एक महिला के लिए ‘आंटी’ कहना एक आदमी को इतना भारी पड़ा कि मामला अदालत तक पहुंच गया और अदालत ने उस व्यक्ति पर करीब पौने दो लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया।
आइये जानते हैं यह पूरा किस्सा... हुआ यूं कि पश्चिम लंदन की एक स्वास्य्य संस्था में काम करने वाली भारतीय मूल की एक नर्स को उसके एक सहकर्मी ने बार बार ‘आंटी’ कह कर बुलाया। करीब 64 साल की इस नर्स का कहना था कि मना करने के बावजूद सहकर्मी ने उसे इसी संबोधन से पुकारा जिससे उन्हें भावनात्मक आघात पहुंचा। यह सहकर्मी घाना का रहने वाला है और उसका कहना था कि उसके देश में ‘आंटी’ शब्द सम्मान का सूचक है। लेकिन अदालत ने इसे जेंडर और उम्र के आधार पर उत्पीड़न मानते हुए कहा कि भले ही ‘आंटी’ शब्द घाना की संस्कृति में बड़ों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए इस्तेमाल होता हो, लेकिन लंदन में यह सब नहीं चलेगा। जब किसी की इच्छा के खिलाफ ऐसा कहा जाए, तो यह आपत्तिजनक हो सकता है। अदालत ने इससे नर्स की भावनाएं आहत होने की बात को मंजूर करते हुए सहकर्मी पर 1,425 पाउंड (लगभग 1.8 लाख रुपये) का हरजाना ठोक दिया। यानी उन लोगों को अब संभल जाना चाहिए जो ‘आंटी’ जैसा संबोधन आए दिन यूं ही रेवड़ी की तरह इस्तेमाल करते रहते हैं। अब किसी को ‘आंटी’ कहने पर अंटी ढीली करनी पड़ सकती है।
अब लंदन से भारत लौटते हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट में लंदन से बिलकुल उलट मामला हुआ। कोर्ट ने आपसी कहासुनी में इस्तेमाल किए जाने वाले 'हरामी' शब्द को अश्लील मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बगैर किसी यौन या अश्लील तत्व के हरामी (बास्टर्ड) शब्द का इस्तेमाल भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294 के तहत अश्लीलता नहीं माना जा सकता। आज के समय में ऐसे शब्द बहस या गुस्से के दौरान आम तौर पर इस्तेमाल होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अश्लीलता का आकलन समाज के वर्तमान मानकों और सोच (contemporary standards) के आधार पर किया जाना चाहिए। गाली-गलौज या अभद्र भाषा अपने आप में अश्लीलता नहीं होती। भले ही किसी को ऐसी भाषा खराब, असभ्य या अनुचित लगे। सिर्फ इसी आधार पर शब्द को ‘अश्लील’ नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि अश्लीलता का संबंध ऐसी सामग्री से है, जो यौन या कामुक विचार पैदा करे, जबकि गाली-गलौज से आमतौर पर घृणा, असहजता या तिरस्कार महसूस होता है, न कि कामुकता। इसलिए इस तरह की भाषा को अश्लील नहीं माना जा सकता।
इन दोनों घटनाओं का सार यही है कि शब्द केवल बोले नहीं जाते, उनके भावनात्मक असर का वजन भी तौला जाता है और यह तराजू हर समाज, हर अदालत और हर परिस्थिति में अलग होती है। कहीं ‘आंटी’ जैसे सहज शब्द से भी चोट लग सकती है, तो कहीं ‘हरामी’ जैसी कड़ी गाली भी कानून की नजर में अपराध नहीं बनती। इससे साफ है कि असली सवाल शब्द का नहीं, उसके संदर्भ, संवेदना और सामने वाले की प्रतिक्रिया का है।
समझ कर समझने वाली बात यही है कि बोलने से पहले यह अच्छी तरह सोच लिया जाए कि कोई भी शब्द सामने वाले को कैसा लगेगा। क्योंकि कानून भले ही आपको हर बार सजा नहीं दे, लेकिन समाज और रिश्ते जरूर दांव पर लग सकते हैं। इसलिए ‘तोल मोल के बोल’ अब सिर्फ कहावत नहीं, बदलते समय की अनिवार्य जरूरत है। तो किसी को भी अब ‘आंटी’ बोलने से पहले सौ बार सोच लीजियेगा... और हां... ‘हरामी’ बोलने से पहले तो हजार बार सोचिएगा, क्योंकि हो सकता है ऐसा करने पर, अदालत पहुंचने से पहले ही आपका ‘फैसला’ हो जाए...