गिरीश उपाध्याय
उर्दू शायरी की मखमली दुनिया में कुछ आवाजें ऐसी हैं जो सिर्फ कानों से होकर नहीं गुजरतीं, बल्कि रूह में उतरकर जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं। पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र ऐसी ही जादुई और मुकम्मल आवाज थे। अब जब यह मर्मांतक खबर आई है कि बशीर बद्र हमारे बीच नहीं रहे, तो ऐसा महसूस होता है जैसे गजल की महफिल का सबसे सुकोमल, सबसे रौशन और सबसे शफ्फाक दिया बुझ गया हो। 91 वर्ष की सुदीर्घ आयु में सांस्कृतिक नगरी भोपाल में उनका निधन हुआ। वे लंबे समय से अस्वस्थता थे। उनका खामोश होना उर्दू अदब के एक युग के अवसान जैसा है।
आम आदमी के दिल की धड़कन
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी और अप्रतिम ताकत यह थी कि वह किताबों की भारी-भरकम अलमारियों और अकादमिक बंदिशों से आजाद होकर सीधे आम आदमी के दिल में धड़कन बनकर उतर जाती थी। उनकी गजलें न केवल महबूब से गुफ्तगू करती थीं, बल्कि वे समकालीन समाज, मानवीय रिश्तों के ताने-बाने, शहरी तन्हाई, अंदरूनी टूटन और सार्वभौमिक इंसानी मोहब्बत की मुकम्मल दास्तान भी बयां करती थीं। वे उन विरल और चुनिंदा शायरों में शुमार थे जिनके शेर मुशायरों के मंचों से निकलकर देश की संसद तक गूंजे, और प्रेमपत्रों की सुगंध से लेकर आधुनिक सोशल मीडिया की डिजिटल वॉल तक, हर वर्ग के लोगों की जुबान पर चढ़ गए।
उनका एक बेहद मक़बूल और कालजयी शेर है, जो उनके जाने पर और भी मौजूं जान पड़ता है:
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।”
यह केवल दो पंक्तियों का शेर नहीं है, बल्कि मानव जीवन की शाश्वत नश्वरता, उसकी अनिश्चितता और स्मृतियों की जीवनदायिनी गरमाहट का एक दार्शनिक और आत्मीय बयान है। इसी तरह बदलते सामाजिक सरोकारों और महानगरीय अजनबीयत पर चोट करता उनका यह शेर आज के इस दौर में और अधिक मार्मिक तथा प्रासंगिक लगता है-
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।”
भाषा का सरलीकरण और अकादमिक अवदान
डॉ. बशीर बद्र की युगांतरकारी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू गजल को ‘मुश्किल और क्लिष्ट शब्दों’ की पारंपरिक कैद से पूरी तरह आजाद किया और उसे रोजमर्रा की जिंदगी और संवाद से जोड़ दिया। उनकी काव्य-भाषा में न तो मीर तक़ी मीर की वह गहरी और बोझिल उदासी थी जो अवसाद की ओर ले जाए, और न ही मिर्ज़ा गालिब की वह दार्शनिक जटिलता थी जिसे समझने के लिए शब्दकोशों की जरूरत पड़े। उनके यहाँ एक सहज, पारदर्शी और बेहद आत्मीय मानवीय स्पर्श था। वे जीवन के सबसे गहरे दर्द को भी बड़ी नजाकत से कहते थे, मगर उसमें कहीं भी बिखरने या टूटने का अहसास नहीं होता था। वे शिद्दत से मोहब्बत लिखते थे, लेकिन उस मोहब्बत में हवाई कल्पनाएं नहीं, बल्कि जीवन का कड़वा और ठोस यथार्थ भी पूरी तरह शामिल रहता था।
उनकी निजी जिंदगी भी उतार-चढ़ाव से भरी किसी महाकाव्यात्मक रचना से कम नहीं रही। उत्तर प्रदेश के अयोध्या (फैजाबाद) जिले में जन्मे बशीर बद्र ने शिक्षा के प्रतिष्ठित केंद्र अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए, एमए और पीएचडी की डिग्रियां हासिल कीं। अकादमिक क्षेत्र में उनका अवदान अत्यंत समृद्ध रहा। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया और बाद में मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी दीर्घ सेवाएं दीं। उनके शोध कार्यों और आलोचनात्मक दृष्टि को साहित्यिक जगत में अत्यंत सम्मान से देखा गया।
त्रासदी से उपजी इंसानियत: मेरठ से भोपाल का सफर
वर्ष 1987 के मेरठ दंगों के दौरान बशीर साहब पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सांप्रदायिक हिंसा की आग में उनका हंसता-खेलता घर, उनकी अमूल्य निजी लाइब्रेरी और वर्षों की अनथक मेहनत से तैयार किया गया बहुत सा अप्रकाशित साहित्यिक कार्य (पांडुलिपियां) जलकर खाक हो गया। यह हादसा उनकी रूह पर एक कभी न भरने वाला गहरा जख्म बनकर रह गया। इस आत्मिक और भौतिक क्षति के बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और झीलों की नगरी भोपाल को अपना स्थायी बसेरा बना लिया। लेकिन इस भयानक त्रासदी की आंच ने उनके भीतर नफरत पैदा नहीं की, बल्कि उनकी शायरी में इंसानियत, अमन और भाईचारे का स्वर और अधिक बुलंद व गहरा होता चला गया।
इसी मानवीय गरिमा और सह-अस्तित्व की भावना को रेखांकित करता उनका यह कालजयी शेर भारत-पाक संबंधों से लेकर हमारे आपसी सामाजिक रिश्तों तक पर हुबहू लागू होता है:
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”
मध्य प्रदेश के समृद्ध उर्दू परिदृश्य में बशीर बद्र
मध्य प्रदेश की जरखेज जमीं ने उर्दू अदब को कई कालजयी नाम दिए, जिनमें डॉ. बशीर बद्र का स्थान सर्वथा विशिष्ट और अलहदा है। इस समृद्ध परिदृश्य में जहाँ कैफ भोपाली पारंपरिक गजल की शास्त्रीय रिवायत और सौंदर्य के उस्ताद थे, वहीं बशीर बद्र ने इस पारंपरिक विरह को तोड़कर गजल को आधुनिक बोध और आम बोलचाल की सहज भाषा दी। निदा फाजली जहाँ महानगरीय संत्रास और शहरी अकेलेपन के गंभीर दार्शनिक रचनाकार हैं, वहीं बशीर बद्र उस तन्हाई में भी स्मृतियों की नरम धूप और आत्मीय रिश्तों की गर्माहट तलाश लेते हैं।
मंचीय महाशक्तियों की बात करें तो राहत इंदौरी अपनी गरजती आवाज, प्रचंड राजनीतिक तेवर और आक्रामक शैली के साथ मंच के दहकते ज्वालामुखी थे, तो इसके विपरीत बशीर बद्र धीमी और मखमली बारिश की तरह थे, जो बिना किसी शोर के सीधे रूह में पैठ जाते थे। जांनिसार अख्तर के यहाँ प्रगतिशील आंदोलन की वैचारिक प्रतिबद्धता थी, जबकि बशीर बद्र किसी भी 'वाद' से परे विशुद्ध मानवीय संवेदना के स्वतंत्र शायर बने रहे। इसी तरह जावेद अख्तर जहाँ आधुनिक गद्य की तार्किकता को पद्य में ढालते हैं, वहीं बशीर साहब मंचीय सुकोमलता के साथ सादगी का नया प्रतिमान रचते हैं। यहाँ तक कि व्यवस्था विरोधी क्रांति के प्रतीक हिंदी गजलकार दुष्यंत कुमार जहाँ व्यवस्था पर प्रहार करते हैं, वहीं बशीर बद्र की गजलें आहत इंसानी रूह को मरहम लगाती हैं।
इन तमाम दिग्गजों के बीच डॉ. बशीर बद्र की जगह सबसे अलग और सबसे खास थी। उनकी गजलें कभी चीखती नहीं थीं, बल्कि वे बहुत आहिस्ता-आहिस्ता, बिना किसी शोर के इंसान के भीतर उतरती चली जाती थीं। उनके यहाँ प्रेम में गहरी शिकायतें हैं, लेकिन कहीं भी कोई कटुता या कड़वाहट का नामोनिशान नहीं है। उनके लेखन में गहरा दर्द है, मगर वह दर्द कभी भी निराशा या कुंठा में तब्दील नहीं होता। यही कारण था कि पुरानी पीढ़ी के रूढ़िवादी अदबी हलकों ने भी उन्हें उतनी ही शिद्दत से सराहा, जितनी दीवानगी के साथ नई पीढ़ी के युवाओं ने उन्हें अपने दिल की धड़कन बनाया। हिंदी भाषी समाज में उर्दू शायरी को सर्वस्वीकार्य और बेहद लोकप्रिय बनाने में उनका ऐतिहासिक योगदान सदैव अतुलनीय माना जाएगा।
मंचीय गरिमा और अकादमिक समन्वय
आमतौर पर जो शायर मुशायरों के मंचों पर अत्यधिक सफल होते हैं, अकादमिक जगत उन्हें गंभीरता से नहीं लेता और जो गंभीरता से विश्वविद्यालयों में पढ़ाते हैं, वे अक्सर मंचों पर नाकाम हो जाते हैं। परंतु डॉ. बशीर बद्र इसके बहुत सुंदर अपवाद थे। उन्होंने मंचीय लोकप्रियता और अकादमिक गरिमा के बीच एक अद्भुत और दुर्लभ समन्वय स्थापित किया था। एक प्राध्यापक और शोधकर्ता के रूप में उनकी साख जितनी मजबूत थी, एक मंचीय रचनाकार के तौर पर उनकी मखमली आवाज, उनका बैठने का सलीका, शेर पढ़ने का उनका खास अंदाज और श्रोताओं से संवाद करने की कला उतनी ही सम्मोहक थी। उन्होंने साबित कर दिखाया कि गजल सिर्फ सुरा और सुंदरी की महफिलों की चीज नहीं है, बल्कि वह आम इंसान की सांसों की भाषा भी हो सकती है। यही वजह है कि उनके शेर किताबों के पन्नों से ज्यादा लोगों के सीनों और उनकी यादों में महफूज रहे।
भोपाल और मध्य प्रदेश से दिल का रिश्ता
डॉ. बशीर बद्र का नाम भले ही समूचे हिंदुस्तान और दुनिया भर में उर्दू शायरी का पर्याय बन गया हो, लेकिन उनके जीवन का अंतिम, सबसे शांत और भावनात्मक अध्याय भोपाल और मध्य प्रदेश की आब-ओ-हवा से ही जुड़ा रहा। 1987 की त्रासदी से बुरी तरह टूट चुके बशीर साहब को भोपाल ने न केवल एक नए शहर की तरह पनाह दी, बल्कि एक ममतामयी मां की तरह अपने आगोश में समेट लिया। मध्य प्रदेश की उपजाऊ सांस्कृतिक मिट्टी, यहाँ की अनूठी मिलीजुली तहजीब, जीवंत अदबी माहौल और मानवीय अपनापे ने उन्हें फिर से कलम उठाने और जिंदगी को नए सिरे से जीने का हौसला दिया। यही कारण है कि बाद के दशकों में भोपाल सिर्फ उनका भौगोलिक निवास स्थान मात्र नहीं रहा, बल्कि वह उनकी शायरी की अंतरात्मा का एक अभिन्न हिस्सा बन गया।
भोपाल का साहित्यिक और सांस्कृतिक संसार भी बशीर बद्र के बिना सर्वथा अधूरा माना जाता है। राजधानी भोपाल के ऐतिहासिक 'भारत भवन' की गहन साहित्यिक गोष्ठियां हों, मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के प्रतिष्ठित और भव्य आयोजन हों, या फिर झीलों के इस खूबसूरत शहर की शामों में सजने वाली मुशायरों की रसीली महफिलें, बशीर बद्र की भौतिक उपस्थिति मात्र ही उनमें एक अलग नरमी, सलीके और गरिमा का संचार कर देती थी। वे उस सुनहरे दौर के अंतिम जीवंत प्रतीक बन गए थे जब भोपाल को देश की हिंदी-उर्दू की साझा सांस्कृतिक राजधानी के रूप में बड़े गर्व से देखा जाता था।
भोपाल और उसकी फिजा का गहरा असर उनकी शायरी में कई मुकामों पर साफ नुमायां होता है। उनका यह मशहूर शेर जैसे भोपाल की शांत शामों और उसके गहरे मानवीय मिजाज का साक्षात बयान लगता है:
“ये चिराग कोई चिराग हैं,
न जला हुआ न बुझा हुआ।”
और उनका यह दूसरा विश्वप्रसिद्ध शेर तो भोपाल जैसी महान तहजीबी नगरी की आत्मा को सीधे स्पर्श करता हुआ प्रतीत होता है, जो कर्म को ही सबसे बड़ा धर्म बताता है:
“घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।”
यह शेर केवल किसी सतही धार्मिक या आध्यात्मिक विमर्श का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह भोपाल की उस ऐतिहासिक साझी संस्कृति और मानवीय संवेदना का अनुपम प्रतीक है, जिसके लिए यह शहर पूरी दुनिया में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों और दायित्वों से जुड़कर उन्होंने नई पीढ़ी के नवांकुर शायरों का न सिर्फ मार्गदर्शन किया, बल्कि उन्हें हमेशा यह सिखाया कि शायरी का सबसे बड़ा और पहला धर्म 'इंसानियत' है।
युग बीत गया पर शब्द जिंदा रहेंगे
आज जब डॉ. बशीर बद्र शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, तब ऐसा शिद्दत से महसूस होता है कि उर्दू अदब का एक बेहद नरम, बेहद आत्मीय और मानवीय अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया। लेकिन सच्चे और महान रचनाकार कभी मरा नहीं करते। वे लोगों की रोजमर्रा की बातचीत में, प्रेमियों के अकेलेपन में, महबूब की यादों में, और इंसानियत की साझी स्मृतियों में हमेशा-हमेशा के लिए जिंदा रहते हैं।
आज अपनी अंतिम विदाई के दुखद मोड़ पर शायद बशीर बद्र स्वयं दुनिया की इस विद्रूपता और संवेदनहीनता को देखकर अपनी ही पंक्तियों में यह कह रहे होते:
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”
डॉ. बशीर बद्र की कालजयी शायरी आने वाली अनगिनत पीढ़ियों को हमेशा यह याद दिलाती रहेगी कि शब्द सिर्फ कोरे अल्फाज या अक्षरों के समूह नहीं होते, बल्कि वे संकट के समय में तड़पती हुई इंसानियत की आखिरी पनाहगाह और उम्मीद की किरण भी हो सकते हैं। जैसा कि मैंने कहा- वे अजब शायर थे, जिनके शेरों में इंसान होता था... गजल के इस महान चिराग को भावभीनी श्रद्धांजलि।