इस पोस्ट के साथ अटैच किए गए वीडियो में ये जो बोल रहे हैं इनका नाम है अनुपम मिश्र। इनका एक परिचय यह है कि ये हिन्दी के प्रख्यात कवि भवानीप्रसाद मिश्र के पुत्र हैं। वही भवानी जी जिनकी एक कविता की ये पंक्तियां बहुत मशहूर हैं-
जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।
पर अनुपम मिश्र का सिर्फ यह परिचय देना उनके अवदान को बहुत छोटा कर देना होगा। वे स्वयं बहुत अच्छे लेखक और वक्ता थे। खासतौर पर पर्यावरण और जल संरक्षण को लेकर जनचेतना जाग्रत करने का उनका काम अद्भुत है। उनकी पुस्तक -आज भी खरे हैं तालाब- इसी संदर्भ में सबसे ज्यादा उद्धृत की जाने वाली पुस्तक है।
जब 19 दिसंबर 2016 को अनुपम जी का निधन हुआ, तो मैंने इसी फेसबुक पर अपनी पोस्ट में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा था-
‘अनुपम जी का जाना तालाबों के खरेपन का सूना हो जाना और उन बूंदों का सूख जाना है, जो कुओं और पोखरों से लेकर सागर तक को "पानीदार" बनाती हैं...’
लेकिन आज मैंने यह जो पोस्ट आपसे शेयर की है, वह किसी और कारण से है। विश्व पर्यावरण दिवस पर राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से जारी यह पोस्ट मेरे पास ‘रील’ की शक्ल में जाने कहां-कहां से घूमती-फिरती हुई आई...
इसको सुनने के बाद मुझे लगा कि इस बारे में अपने मित्रों और खासकर मीडिया एवं जनसंचार की पढ़ाई करने वाले या इस क्षेत्र को अपना करियर बनाने वाले बच्चों से बात करनी चाहिए...
मैं माखनलाल विश्वविद्यालय में जब जनसंचार के बच्चों को पढ़ाता हूं तो कई बच्चे यह सवाल अकसर पूछते हैं कि लिखना और बोलना कैसे सीखा जाए...
तो ऐसे बच्चों के लिए, जो ऐसा चाहते हैं, यह पोस्ट बहुत अच्छा उदाहरण हो सकती है। इसे ध्यान से सुनें और महसूस करें। कितनी सहज, सरल और बोलचाल की भाषा में अनुपम जी कितनी गंभीर बात कह दे रहे हैं। इसकी खूबसूरती यह है कि भाषा की अत्यंत सहजता और सरलता विषय की गंभीरता को कतई कम नहीं कर रही, बल्कि उसे और अधिक संप्रेषणीय और विश्वसनीय बना रही है। जिन लोगों को कुछ शब्द अंग्रेजी में ही समझ में आते हैं उनके लिए बता दूं कि संप्रेषणीय को अंग्रेजी में communicable कहते हैं।
और इस कहे हुए पर मोरपंख यह है कि गद्य होने के बावजूद यह एक सुंदर सी कविता से किसी भी मायने में कम नहीं लगता।
तो आप इसकी भाषा को, इसकी अभिव्यक्ति को, कहने की शैली को, कहे हुए की संप्रेषणीयता को, विषय लेने के तरीके को, सबको ध्यान से सुनें व देखें तो आपको पता चलेगा कि बात को बगैर vocal cords पर जोर डाले या चेहरे को बिना आड़ा-टेढ़ा किए, बहुत सामान्य भाव-भंगिमा के साथ भी कैसे प्रभावी और दिल के भीतर तक उतर जाने वाली बनाया जा सकता है।
ऊपर मैंने एक और शब्द का इस्तेमाल किया है कि -इसे सुनें और महसूस करें...
दरअसल यह जो महसूस करना है, वही संवाद को समझने और गुनने की कला का मर्म है।
मैं कई दिनों से सोच रहा था कि जो बच्चे मुझसे अकसर यह सवाल पूछते हैं कि लिखना और बोलना कैसे सीखा जाए, उनके लिए कुछ करना चाहिए। विश्वविद्यालय में ‘युवा संसद’ प्रतियोगिता की तैयारी करवाते समय भी बहुत सारे बच्चों के साथ यह दिक्कत महसूस होती है।
यह रील देखने के बाद लगता है रियल लाइफ में बच्चों को सिखाने के लिए कुछ करना तो बनता है...
क्यों न ऐसा कोई छोटा-मोटा प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करूं जो बच्चों को इस कला की बाहरखड़ी सिखा सके...
आप क्या कहते हैं, बताइयेगा...
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