पोहा पुराण
गिरीश उपाध्याय
यकीन मानिए, यदि अखबार में वह फुल पेज का विज्ञापन न पढ़ा होता तो मुझे मालूम ही नहीं चलता कि दुनिया में ‘विश्व पोहा दिवस’ जैसा भी कोई दिन मनाया जाता है और उसकी तारीख 7 जून को पड़ती है।
अब यह बात यदि मेरे किसी इंदौरी मित्र को पता चल जाए तो वह मुझे तत्काल इंदौर की नागरिकता से बेदखल करने की मांग कर सकता है।
“कैसा आदमी है रे तू... पोहा खाता है, सेव खाता है, जलेबी खाता है और पोहा दिवस नहीं जानता...!”
संभव है इसके बाद मेरे खिलाफ कोई जनआंदोलन भी खड़ा हो जाए।
आखिर हम उस पीढ़ी के लोग हैं जो पूरे आत्मविश्वास से कह सकती है कि हम पोहा खाकर बड़े हुए हैं। आज के बच्चों की तरह हमारा बचपन पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और फ्रेंच फ्राइज के बीच नहीं बीता। हमारे लिए सुबह का मतलब था रसोई से आती हल्दी और करी पत्ते की खुशबू, गरमागरम पोहे की भाप और कहीं न कहीं से छनकर आती जलेबी की मिठास।
इस देश में लोगों की पहचान उनकी भाषा, जाति, धर्म, प्रदेश और राजनीतिक विचारधारा से होती होगी। इंदौर में नहीं।
इंदौर में आदमी दो ही तरह का होता है - एक जो पोहा खाता है और दूसरा जो पोहा नहीं खाता... और मुझे लगता है ऐसा आदमी इंदौर में खोजना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है...
तीसरी कोई श्रेणी अभी तक खोजी नहीं जा सकी है।
दरअसल पोहा सिर्फ नाश्ता नहीं है। यह भारतीय जीवन का वह सांस्कृतिक दस्तावेज है जिसे किसी ने लिखा नहीं, लेकिन करोड़ों लोगों ने जीया है। यह उन दुर्लभ व्यंजनों में से एक है जो रसोई से निकलकर समाज, संस्कृति, स्मृतियों और रिश्तों का हिस्सा बन जाते हैं।
पोहा आखिर है क्या?
यदि किसी विदेशी को समझाना हो तो कहेंगे कि यह चपटे किए गए चावल से बना भारतीय नाश्ता है। लेकिन यह परिभाषा उतनी ही अधूरी है जितनी यह कहना कि ताजमहल एक इमारत है या गंगा एक नदी।
पोहा एक भावना है।
भारत के अलग-अलग हिस्सों में इसके अलग-अलग नाम हैं। कहीं यह चूड़ा है, कहीं चिवड़ा, कहीं चिरा, कहीं अवल, कहीं अवलक्की और कहीं अतुकुलु। नाम बदलते रहते हैं, लेकिन मूल भावना वही रहती है - कम साधनों में अधिक स्वाद और अधिक अपनापन।
संभव है कि इतिहासकार पोहे की उत्पत्ति पर बहस करते रहें। कोई उसे प्राचीन भारतीय खाद्य परंपरा से जोड़े, कोई कृषि सभ्यता से, कोई चावल प्रसंस्करण की तकनीक से। लेकिन आम भारतीय के लिए पोहे का इतिहास उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितनी उसकी उपस्थिति।
वह हमारे घरों में था।
हमारे स्कूल जाने से पहले था।
कॉलेज की भागदौड़ में था।
पहली नौकरी के दिनों में था।
और आज भी है।
कुछ चीजें इतिहास की किताबों में दर्ज होती हैं, कुछ लोगों की स्मृतियों में। पोहा दूसरी श्रेणी में आता है।
भारत का सबसे लोकतांत्रिक भोजन
भारत में हजारों व्यंजन हैं, लेकिन पोहे जैसी लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा बहुत कम खाद्य पदार्थों को मिली है।
यह अमीर और गरीब दोनों का भोजन है।
यह पांच सितारा होटल के बुफे में भी दिखाई देता है और रेलवे प्लेटफॉर्म के ठेले पर भी।
इसे करोड़पति भी खाता है और दिहाड़ी मजदूर भी।
यह शायद उन गिने-चुने भारतीय व्यंजनों में है जिसने सामाजिक और आर्थिक वर्गों के बीच की कई दीवारें सहजता से पार कर ली हैं।
दुनिया भर के समाजशास्त्री यदि भारतीय लोकतंत्र की सांस्कृतिक व्याख्या करना चाहें तो उन्हें संसद भवन के साथ-साथ किसी पोहे की दुकान पर भी कुछ समय बिताना चाहिए।
वहां उन्हें भारत का वास्तविक सामाजिक मिश्रण दिखाई देगा।
इंदौर: जहां पोहा नाश्ता नहीं, पहचान है
यदि किसी दिन इंदौर नगर निगम यह घोषणा कर दे कि शहर की आधिकारिक पहचान अब राजबाड़ा, लालबाग या सराफा नहीं बल्कि पोहा है, तो मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं होगा।
क्योंकि यहां पोहा नाश्ता नहीं है।
यह जीवन शैली है।
यह सांस्कृतिक पहचान है।
यह शहर की सामूहिक स्मृति है।
सुबह छह बजे से नौ बजे तक किसी भी लोकप्रिय पोहा दुकान पर खड़े होकर देखिए।
डॉक्टर आएंगे।
वकील आएंगे।
पत्रकार आएंगे।
व्यापारी आएंगे।
छात्र आएंगे।
नेता आएंगे।
रिटायर्ड बुजुर्ग आएंगे।
और इन सबके बीच कोई ऐसा भी होगा जिसे अभी तक यह समझ नहीं आया होगा कि देश की सारी समस्याओं का समाधान आखिर क्यों नहीं निकल पा रहा है।
लेकिन पोहे की प्लेट के सामने खड़े होकर सभी समान हो जाते हैं।
कई राजनीतिक रणनीतियां यहीं बनी होंगी।
कई व्यापारिक समझौते यहीं तय हुए होंगे।
कई पत्रकारों की खबरें यहीं जन्मी होंगी।
और कई दोस्तियां तो निश्चित रूप से यहीं पकी होंगी।
पोहा और जलेबी: भारतीय संस्कृति का सबसे सफल गठबंधन
यदि दुनिया के महानतम रहस्यों की सूची बनाई जाए तो उसमें एक स्थान पोहा और जलेबी के रिश्ते को भी मिलना चाहिए।
पहली नजर में दोनों का साथ असंभव लगता है।
एक नमकीन।
दूसरी मीठी।
एक हल्का।
दूसरी चाशनी से लबालब।
तर्क कहता है कि दोनों अलग-अलग रहने चाहिए।
लेकिन इंदौर कहता है - “नहीं, दोनों साथ ही अच्छे लगते हैं।”
शायद यही भारतीयता है।
विरोधी प्रतीत होने वाली चीजों को साथ लेकर चलना।
पोहा और जलेबी का मेल हमें याद दिलाता है कि जीवन सिर्फ नमकीन नहीं होता, सिर्फ मीठा भी नहीं होता। दोनों का संतुलन ही उसका वास्तविक स्वाद बनाता है।
सेव, जीरावन और स्वाद का दर्शन
यदि पोहा शरीर है तो सेव उसकी आत्मा है।
और यदि सेव आत्मा है तो जीरावन उसका दर्शनशास्त्र।
किसी बाहरी व्यक्ति को यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन किसी इंदौरी को नहीं।
इंदौर का पोहा अकेला नहीं आता।
उसके साथ पूरी बारात आती है।
बारीक सेव।
रतलामी सेव।
हरा धनिया।
बारीक कटी प्याज।
अनार के दाने।
नींबू।
और ऊपर से जीरावन।
एक ही पोहे के दस-दस रूप हो सकते हैं।
किसी को ज्यादा सेव चाहिए।
किसी को ज्यादा प्याज।
किसी को तीखा।
किसी को खट्टा।
किसी को उसल के साथ।
किसी को मिसल शैली में।
यानी पोहा सिर्फ व्यंजन नहीं, लोकतंत्र है। हर स्वाद को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।
देशभर का पोहा: एक, पर अनेक
महाराष्ट्र जाइए तो कांदा पोहा मिलेगा।
नागपुर जाइए तो तरी पोहा आपका इंतजार कर रहा होगा।
गुजरात में पोहा अलग अंदाज में मिलेगा।
कर्नाटक में वह अवलक्की बन जाएगा।
तमिलनाडु में अवल।
तेलंगाना में अतुकुलु।
बंगाल में चिरा।
ओडिशा में चूडा।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि हर प्रदेश उसे अपने स्वाद के अनुसार बदल लेता है, फिर भी पोहा अपनी मूल पहचान नहीं खोता।
यह शायद भारत की सांस्कृतिक संरचना जैसा ही है - विविधता में एकता का स्वादिष्ट संस्करण।
मेहमाननवाजी की भाषा
हमारे यहां यदि कोई अचानक घर आ जाए तो पहला सवाल अक्सर यही होता है -
“चाय लोगे?”
लेकिन मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक घरों में इसके साथ एक दूसरा सवाल भी जुड़ा होता है -
“पोहा बना दें क्या?”
ध्यान दीजिए, यह सिर्फ भोजन का प्रस्ताव नहीं है।
यह अपनत्व का प्रस्ताव है।
यह कहने का तरीका है कि आप अपने हैं।
आपके लिए घर की रसोई खुली है।
आपका स्वागत है।
कई बार रिश्ते बड़ी-बड़ी दावतों से नहीं, पोहे की एक साधारण प्लेट से बनते हैं।
पोहा और प्रेम
मुझे पूरा विश्वास है कि इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में हजारों प्रेम कहानियों की शुरुआत किसी महंगे कैफे में नहीं, बल्कि पोहा-जलेबी की दुकान पर हुई होगी।
दो लोग पहली बार मिले होंगे।
बातचीत शुरू हुई होगी।
और बीच में पोहे की एक प्लेट रही होगी।
उस प्लेट ने शायद उतना ही महत्वपूर्ण काम किया होगा जितना बाद में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने किया।
क्योंकि भोजन सिर्फ पेट नहीं भरता, बातचीत भी शुरू कराता है।
पोहा अर्थव्यवस्था
यदि कभी कोई अर्थशास्त्री गंभीरता से अध्ययन करे तो संभव है उसे पता चले कि पोहे ने हजारों परिवारों की आजीविका बनाई है।
पोहा बनाने वाले।
सेव बनाने वाले।
नमकीन उद्योग।
मसाला विक्रेता।
प्याज और नींबू बेचने वाले।
ठेले वाले।
छोटी दुकानें।
बड़ी दुकानें।
कैटरिंग व्यवसाय।
एक साधारण सी प्लेट के पीछे रोजगार की पूरी श्रृंखला खड़ी है।
यह सिर्फ भोजन नहीं, अर्थव्यवस्था भी है।
क्यों नहीं होगा पोहे का दिवस?
जब दुनिया में डोनट दिवस हो सकता है, पिज्जा दिवस हो सकता है, चॉकलेट दिवस हो सकता है, तो पोहे का दिवस क्यों नहीं हो सकता?
आखिर यह उस देश का भोजन है जहां करोड़ों लोग सुबह की शुरुआत इसी से करते हैं।
हो सकता है कि विश्व पोहा दिवस किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने घोषित न किया हो।
हो सकता है कि इसकी शुरुआत किसी छोटे अभियान से हुई हो।
लेकिन यह भी सच है कि किसी दिवस की असली ताकत उसके सरकारी दर्जे में नहीं, लोगों के प्रेम में होती है।
और पोहे के प्रति लोगों का प्रेम किसी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं है।
एक प्लेट में पूरा जीवन
पोहे की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह सिर्फ स्वाद नहीं देता, स्मृतियां भी देता है।
उसमें बचपन की सुबहें हैं।
मां की रसोई है।
स्कूल की घंटी है।
कॉलेज के दोस्त हैं।
पहली नौकरी की भागदौड़ है।
रेलवे स्टेशन की चहल-पहल है।
घर लौटने की खुशी है।
और अपने शहर की पहचान है।
शायद इसलिए पोहा कभी पुराना नहीं पड़ता।
फैशन बदलते हैं।
रेसिपियां बदलती हैं।
खाने के चलन बदलते हैं।
लेकिन कुछ चीजें समय से बड़ी होती हैं।
पोहा उन्हीं में से एक है।
मुझे लगता है कि चावल ने किसी दिन सोचा होगा कि चलो कुछ बड़ा करते हैं
कुछ तूफानी सा... और तभी उसने खुद को पोहे में तब्दील किया होगा...
इसलिए विश्व पोहा दिवस पर यदि आप सचमुच पोहे का सम्मान करना चाहते हैं तो किसी बड़े आयोजन की जरूरत नहीं है।
बस एक प्लेट गरमागरम पोहा खाइए।
ऊपर से थोड़ी सेव डालिए।
नींबू निचोड़िए।
यदि इंदौरी हैं तो जलेबी भी रख लीजिए।
और फिर याद कीजिए उन तमाम लोगों को, जिनके साथ जीवन के किसी मोड़ पर आपने पोहा साझा किया था।
यकीन मानिए, आपको महसूस होगा कि यह सिर्फ नाश्ता नहीं है।
यह भारतीय जीवन का सबसे विनम्र, सबसे आत्मीय और सबसे स्वादिष्ट संस्मरण है।