गिरीश उपाध्याय

करीब सात महीने पहले मैंने इंदौर की युवा क्रिकेटर अनादि तागड़े के बारे में कुछ लिखा था। उस समय वूमेन्स प्रीमियर लीग के ऑक्शन की चयन सूची जारी हुई थी और उसमें इस प्रतिभाशाली खिलाड़ी का नाम नहीं था। जाहिर है, अनादि के लिए वह समय निराश होने का था।

उस समय मैंने कहा था कि हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम बच्चों को असफलता का सामना करना नहीं सिखाते। हम उन्हें जीत का उत्सव मनाना तो सिखाते हैं, लेकिन हार के बाद मुस्कुराकर खड़े रहना नहीं सिखाते। हम उन्हें सपने देखना सिखाते हैं, लेकिन सपनों के टूटने के बाद फिर से उन्हें जोड़ना नहीं सिखाते।

आज मैं फिर एक बार अनादि के बारे में लिख रहा हूं। आज प्रसंग यह है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने श्रीलंका के खिलाफ होने वाली श्रृंखला के लिए भारतीय महिला अंडर-19 टीम की घोषणा की है। संयोग देखिए कि उसमें अनादि तागड़े का नाम केवल एक नहीं, बल्कि टी-20 और वनडे दोनों टीमों में शामिल है।

खबर मालूम चलते ही सबसे पहले वह पुराना लेख याद आना लाजिमी था। और इसके साथ ही उस दिन का अनादि और उसके परिवार का चेहरा आंखों के सामने घूम गया।

उस समय अनादि के पिता और मेरे पुराने पत्रकार मित्र एवं नईदुनिया व स्वदेश के सहकर्मी अनुराग तागड़े ने बेटी के नाम एक खुला खत लिखा था, जिसका शीर्षक था - "अनादि, हमें लगातार आगे बढ़ते रहना है..."

उस पत्र में अनुराग ने अनादि से कहा था -"असफलता से निराश होने के बजाय उसका डटकर सामना करना है। हम रुकेंगे नहीं... थकेंगे नहीं... दमदार वापसी करेंगे..."

वह एक परिवार का, असफलता की घड़ी में चट्टान की तरह अपनी बेटी के साथ खड़े होने का अनुकरणीय उदाहरण था। मैंने इसी को अपनी टिप्पणी का विषय बनाते हुए तब लिखा था कि हमें बच्चों को असफलता का स्वाद भी चखने देना चाहिए।

आज अनादि दुगुनी ताकत से सफल होकर लौटी है। सच कहूं तो मुझे आज की सफलता से ज्यादा उस दिन और आज के दिन के बीच का समय महत्वपूर्ण लगता है। क्योंकि कहानी चयन की नहीं है। कहानी उस यात्रा की है, जो चयन और अचयन के बीच तय की गई।
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हम अक्सर सफलता को अंतिम परिणाम में खोजते हैं। हमें लगता है कि मेडल, ट्रॉफी, नौकरी, परीक्षा में चयन या टीम में जगह मिल जाना ही सफलता है। लेकिन खेल और जीवन दोनों हमें एक अलग पाठ पढ़ाते हैं।

सफलता दरअसल उस दिन पैदा होती है, जिस दिन कोई बच्चा असफल होने के बाद भी अगली सुबह उठकर फिर अभ्यास के लिए मैदान पहुंच जाता है। अनादि की कहानी भी शायद ऐसी ही है।

वूमेन्स प्रीमियर लीग में जब चयन नहीं हुआ। निराशा हुई होगी। मन भी टूटा होगा। परिवार भी कुछ समय के लिए उदास हुआ होगा। आखिर सपने केवल खिलाड़ी के नहीं होते, पूरे परिवार के होते हैं।

जब कोई बेटी सुबह अंधेरे में उठकर अभ्यास के लिए निकलती है तो उसके साथ माता-पिता की नींद भी यात्रा करती है। जब वह मैदान में पसीना बहाती है तो घर का पूरा वातावरण उसके लक्ष्य के साथ जुड़ जाता है।

लेकिन निराशा के उस पड़ाव पर अनादि का परिवार दूसरों से अलग साबित हुआ। उन्होंने चयन सूची को अंतिम सत्य नहीं माना। उन्होंने मेहनत को जारी रखा। उन्होंने विश्वास को बचाए रखा। और सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्होंने बच्ची को यह महसूस नहीं होने दिया कि एक सूची में नाम न होना उसके सपनों का अंत है।
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मुझे लगता है कि हर खिलाड़ी की सफलता के पीछे एक अनकहा परिवार खड़ा होता है। मैदान में एक नाम दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे कई चेहरे होते हैं। पिता की चिंता होती है। मां की प्रार्थनाएं होती हैं। दादा-दादी और परिजनों का आशीर्वाद होता है। कोच का मार्गदर्शन होता है। और उन अनगिनत दिनों का मौन संघर्ष होता है, जिनकी कोई खबर नहीं बनती।

समाचार पत्रों में चयन की खबर छपती है, लेकिन उस चयन के पीछे बिताए गए हजारों घंटों की कहानी कहीं दर्ज नहीं होती। अनादि की उपलब्धि में भी मुझे यही दिखाई देता है। एक बेटी का संघर्ष। एक परिवार का धैर्य। और एक सपना, जिसने हार मानने से इनकार कर दिया।

अनादि के दादा डॉ. रमेश तागड़े प्रसिद्ध संगीतज्ञ हैं। अनादि को लक्ष्य के प्रति साधना और तपस्या का गुण भी शायद अपने संगीत-साधक परिवार से ही मिला है। उसने खेल को भी सुर की तरह ही साधा। बधाई तो अनुराग को भी, जिन्होंने अनादि के खेल को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था।
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दरअसल खेल हमें जीवन का सबसे बड़ा दर्शन सिखाता है। यह बताता है कि हर हार स्थायी नहीं होती। हर चयन अंतिम नहीं होता। हर असफलता निर्णायक नहीं होती। और हर सफलता अचानक नहीं आती। उसके पीछे तैयारी के लंबे वर्ष होते हैं।

आज भारतीय टीम की सूची में नाम चमक रहा है, लेकिन इस उपलब्धि की शुरुआत शायद वर्षों पहले किसी नेट प्रैक्टिस, किसी स्थानीय प्रतियोगिता या किसी साधारण से मैदान में हुई होगी, जहां एक छोटी बच्ची ने पहली बार हाथ में गेंद थामी होगी। अनादि मध्यम तेज गति की गेंदबाज है, लेकिन बल्ले पर भी उसका हाथ कमजोर नहीं है।

सपने हमेशा बड़े मंचों पर नहीं जन्म लेते, वे अक्सर छोटे मैदानों और साधारण परिवारों में जन्म लेते हैं।
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सात महीने पहले मैंने लिखा था कि असफलता भी सफलता की सीढ़ी का एक पायदान है। आज अनादि की सफलता उसी बात की जीवंत पुष्टि बनकर सामने खड़ी है। क्योंकि यदि उस समय निराशा जीत जाती, यदि प्रयास रुक जाते, यदि विश्वास कमजोर पड़ जाता, तो शायद आज यह दिन नहीं आता।

यही कारण है कि यह उपलब्धि केवल अनादि की नहीं है। यह उन सभी बच्चों की उपलब्धि है जो किसी सूची में नाम न आने के बाद भी अपने सपनों से समझौता नहीं करते। यह उन सभी माता-पिताओं की उपलब्धि है जो बच्चों पर अपेक्षाओं का बोझ डालने के बजाय उनका हाथ थामे रखते हैं। यह उन सभी शिक्षकों और प्रशिक्षकों की उपलब्धि है जो प्रतिभा को परिणाम से बड़ा मानते हैं।
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आज इंदौर की यह बेटी भारत की जर्सी पहनने जा रही है। निश्चित रूप से यह गर्व का क्षण है। लेकिन मुझे लगता है कि इस उपलब्धि का सबसे बड़ा महत्व किसी क्रिकेटीय आंकड़े में नहीं है। इस उपलब्धि का महत्व उस संदेश में है, जो यह हजारों घरों तक पहुंचा रही है।

संदेश यह कि किसी सूची में नाम न होना कहानी का अंत नहीं होता।

संदेश यह कि सपनों की यात्रा में ठोकरें भी पड़ती हैं।

संदेश यह कि धैर्य, परिश्रम और विश्वास का कोई विकल्प नहीं है।

और संदेश यह भी कि बच्चों को केवल जीतना नहीं, हारकर फिर उठना भी सिखाना चाहिए।
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आज अनादि के लिए तालियां बज रही हैं। बजनी भी चाहिए। लेकिन इन तालियों में उन सभी लोगों का हिस्सा भी शामिल है, जिन्होंने मुश्किल दिनों में उसका साथ नहीं छोड़ा। क्योंकि सफलता की असली पहचान यही है कि वह अकेले नहीं आती। वह अपने साथ उन सभी लोगों का सम्मान भी लेकर आती है, जिन्होंने रास्ते में आपका हाथ थामे रखा था।

रहा सवाल अनादि का, तो उसके लिए आज मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा -

वह रुकी नहीं।

वह थकी नहीं।

वह टूटी नहीं।

वह बस चलती रही।

और आखिरकार...

अनादि भारत की जर्सी लेकर लौटी।

रुकी नहीं... थकी नहीं... अनादि भारत की जर्सी लेकर लौटी
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